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________________ मन्त्रि-समुद्देश १६ . . . n बांमष्ट' विद्वान ने भी कहा है कि राजाको मंत्ररणाके समय अपने मुखको प्राकृति शुभ और शरीरका प्रानि मौम्य रयनी चाहिये तथा निद्रा, मद और आलस्य छोड़ देना चाहिये || मंत्र (निश्चित विचार) को शोघ्र ही कार्यरूपमें परिणत करने का आदेश उद्धनमन्त्री न दीर्घसूत्रः स्यात् ।।४।। अथवितिगी विचार निश्चित होजानेपर उसे शीघही कार्यरूपमें परिणत करनेका यत्न करे, इस में उस पालम्य नहीं करना चाहिए । सारांश यह है कि मंत्रमें विलम्ब करनेसे उसके फूटनेका भय रहता है जिमग कायमद्वि नही होपाती। अत: उमेश ही कार्यरूपमें परिणत करना चाहिये ।।४२॥ कौटिल्य ने भी कहा है कि 'अर्थका निश्चय करके उसको शीघ्र ही कार्यरूपमें परणित करना चाहिये, ममयको व्यर्थ बिनाना श्रेयस्कर नहीं ॥१॥ शुक' विद्वान ने कहा है कि जो मनुष्य विचार निश्चित करके उसी समय उसका आचरण नहीं वाना. उस मंत्र का फल (कायं निद्धि) प्राप्र नहीं होता ।।शा' निश्चित विचारक अनुमार कार्य न करने से हानि अननुशान छात्रवत् कि मंत्र ख* ||४३॥ ___ अर्थ-विजिगीएको कर्तव्य-पालनके विना केवल निश्चित विचारसे आलसी विद्यार्थीको तरह 5.1 लाम नहीं होना-कार्य-मिद्धि नहीं होती। जिमप्रकार प्रालसी शिष्य गुरुसे मंत्र सीख लेता है, निदनकन जप वगैरह का प्राचरण नहीं करता, अतः उमका मंत्र सीखना निष्फल है, सीप्रकार जिनी मी यदि मंत्र के अनुकूल फतव्यमें प्रवृत्त नहीं होता तो उसकी मंत्रणा भी व्यर्थ है ॥३।। शुक' विद्वानन कहा है कि 'जो विजिगीषु मंत्रका निश्चय करके उसके अनकूल कार्य नहीं करता, 'नगमका का मंच अानसी छात्र के मंत्री तरह व्यर्थ होजाता है ।।१।।' न वानको दशान्त द्वारा पुनः समर्थन न छोपधिपरिज्ञानादेव व्याधिशमः ॥४॥ अथ--कयल औषधिके शानमात्र रोगकी शांति नहीं होसकती। सारांश यह है कि जिस प्रकार केवल औषधक जानलेने मासे व्याधियोंका नाश नहीं होता किन्तु उसके सेवनसे दो होता है, उसी प्रकार विचार मात्र मन्धि य विमह आदि कार्य सिद्ध नहीं होसकत, किन्तु मंत्रणा अनुरुल प्रवृत्ति कान कार्य सिद्ध होते हैं ॥४४|| ६ नया :- मंत्रांग्रस्था महीपेन कम्यं शुभचेष्टितम् । श्राकारश्य शुभः कार्यस्थास्या निधामदासाः ॥॥ २ तथा । कोरिय:-'अवानाधकाल नातिकमना-कौटिल्य अर्थशास्त्र मंत्राधिकार मा. : N. --पो मंत्र' मंपिया नु नानुयाम करोनि च । तरतणासस्य मंत्रस्य जायो नात्र संशयः ॥३॥ • मानचिना व नन कि मंग' इस प्रकार मु. व ६० लि. मूल प्रतियों में पाठ , उसका अर्थ यह है कि +11 में गत विजिना चलनश्चित विचार में कोई लाभ नहीं। ..च गु+:- मं ।' मंगवा ] मन: करोनि च ! सनस्य पर्यत याति छात्रस्येव प्रमादिनः ॥३॥
SR No.090304
Book TitleNitivakyamrut
Original Sutra AuthorSomdevsuri
AuthorSundarlal Shastri
PublisherGyansagar Vagarth Vimarsh Kendra Byavar
Publication Year
Total Pages454
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Literature, P000, & P045
File Size12 MB
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