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________________ -निमित्तशास्त्रम् - २. जो आकाश में प्रकट होते हो। जैसे- सूर्योदय के समय दिशायें लहू के समाज लाल होना अशता सूर्यास्त के समय सौ से धुआँ निकल रहा है । ऐसा दिखाई देना। 10. जिसका शब्द सुनाई दे । जैसे- काकशब्द, उलूकशब्द आदि। । जे चारणेण दिठ्ठा अणं दो सायसहम्मणाणेण। । जो पाहुणेण भणिया तं खलु तिविहेण वोच्छामि ||५|| अर्थ : धारणमुनियों ने जिसतरह देखा तथा उन्होंने अपने ज्ञान के द्वारा जिसप्रकार से उसके शुभाशुभ का कथन किया - अन्य पण्डितों ई ने भी जैसा वर्णन किया है, मैं उस तीन प्रकार के निमित्तज्ञान का वैसा ही वर्णन करता हूँ। भावार्थ : जैनागम की परिपाटी पूर्वाचार्यों का अनुसरण करने वाली है। अन्धकर्ता कहते हैं कि मैं अपने मन से कुछ भी नहीं कहूँगा । पूर्व में चारणऋद्धि के धारक मुनियों ने या अन्य विद्वान आचार्यों ने जैसा वर्णन किया है, मैं भी वैसा ही वर्णन करूंगा। सूरोदय अच्छमणे चंदमसरिक्खमम्गहचरियं । तं पिच्छियं णिमित्तं सव्वं आएसिहं कुणहं ॥६॥ अर्थ: सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त के पश्चात् चन्द्र या नक्षत्र आदि के मार्ग का अवलोकन करके निमित्तों को जानना चाहिये । भावार्थ : इस ग्रन्थ में सर्वप्रथम आकाशीय निमित्तों का कथन किया जा रहा है। आकाशमण्डल सूर्योदय व सूर्यास्त के समय आकाशमण्डल कैसा है ? चन्द्रगति व नक्षत्रादिकों की गति कैसी है ? इन सब का ज्ञान करके निमित्तहानी उसका फल जान लेता है।
SR No.090300
Book TitleDavvnimittam
Original Sutra AuthorRushiputra Maharaj
AuthorSuvidhisagar Maharaj
PublisherBharatkumar Indarchand Papdiwal
Publication Year2003
Total Pages133
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size3 MB
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