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________________ लाराधना पाश्चाम: जं एवं तलोकं पाम्वदि सब्यस्स जीविदं तह्मा ॥ जीविदधादो जीवस्स होदि लोकघादसमो । ७८३ ।। त्रैलोक्येन यता मुल्यं जीवितव्यस्य जायते ॥ जीवजीवितघालोस्तबलोक्यहननोपमः ॥ ८१४ ।। प्रहण दुईभसंतापा मग साधकम् ॥ एकाग्रमानसो रक्ष निधानमिच सर्वदा ।। ८१५ ॥ अर्थ-संपूर्ण जीवोंका जीवित क्योंकि त्रैलोक्यके कीमतकी बराबरीका है अतः जीवक जीवितका धात ऋग्ना त्रैलोक्यघातके समान है. अहिंसातमहत्ता निवेदयति णस्थि अणूदो अप्पं आयासादो अणूणयं णस्थि ।। जह तह जाण महलं ण क्यमहिंसासमं अस्थि ।। ७८४ ।। अल्पं यथाणुतो नास्ति महदाकाशतो यथा ॥ अहिंसात्रततो नास्ति तथा परमुरुबतम् ॥ ८१६ ॥ विजयोदया-त्यि अणूलो मापं नारयणोरष सम्यत्किचिद्रव्यं । आयासादो गणूणयं स्थि । आकाशाया अन्यन्मनास्ति यथा तथान्यतं अहिंसातो महम्नास्ति । - अर्थ-इस जगतमें अणु से छोटी दुसरी वस्तु नहीं है और आकाशसे भी बडी कोई चीज नहीं है. इसी प्रकार आहिंसा व्रतसे दूसरा कोई बड़ा व्रत नहीं है, जह पव्वदेसु मेरू उच्याओ होइ सब्बलोयम्मि । तह जाणसु उव्वायं सीलेसु वदेसु य अहिंसा ॥ ७८५ ॥ सम
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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