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आश्वामः
अर्थ--दपके अनेक प्रकार हैं. क्रीडा स्पर्धा, व्यायाम, कपट, रसायनसेवा, हास्य, गीत और श्रृंगारमूलाराधना
वचन, दौडना और कृदना ये दर्पके प्रकार है. प्रमादके पांच प्रकार हैं-विकथा, कलाय, इंद्रियोंके विषयों में आसान, निद्रा और स्नेह. अथवा संक्लिष्ट हस्तकम, कुशीलानुवृत्ति, बाह्यशास्त्र, कान्यकरण, और ममिति में उपयोग -देना नेमका है
छदन करना, भेदन करना, पीधना, आघात करना, चुभना, खोदना, वांधना, फाहना, धोना, रंगाना वेष्टन करना, गूंथना, पूर्ण करना, एकत्र करना, लेपन करना, फेकना, चित्र बनाना इत्यादि कार्यको संक्लिष्ट हस्त कर्म कहते हैं.
- स्त्री पुरुपके लक्षणों का वर्णन करने वाले शास्त्रको निमित्त शास्त्र कहते हैं. ज्योतिर्ज्ञान, छंदःशास्त्र, अर्थशास्त्र, वैद्यकशास्त्र, लौकिकशास्त्र, मंत्रवाद इत्यादि शाखाको बाह्यशास्त्र कहते हैं.
उपयोग देकर भी जिससे अतिचारोंका सम्यग्ज्ञान नहीं होता है उसको अनाभोगकृत अतिचार JI कहते हैं. अथवा मन दूसरे तरफसे लगनेपर जो अतिचार होता है वह भी अनाभोग कृत है.
. नदीपूर, अग्नि लगना, महायायु बहना, दृष्टि होना, शत्रुके सैन्यसे घिरजाना, इत्यादिकः कारणों से होनेवाले अतिचारोंको आपात अतिचार कहते हैं.
रोगसे पीडित होना, शोकसे दुःखित होना, वेदनासे व्यथित होना, ऐसे आर्तताके तीन प्रकार है इस से होनेवाले अतिचारोंको आततातिचार कहते है.
रसमें आसक्त होना और बहुत बडबड करना इस कार्यको तित्तिणदा अतिचार कहते हैं.
शंकित-पिच्छिका वगैरे उपयोगी द्रव्यों में ये सचित्त है या अचित हैं ऐसी शंका उत्पन्न होनपर भी मोडना, फोडना, भक्षण करना, आहार और उपकरण और बसतिका ये पदार्थ उद्गनादिदोष रहित है अथवा नहीं है एसी शंका आनेपर भी उनको स्वीकारना यह शंकितातिचार है.
सहसा-अशुभवचनमें और अशुभ विचारोंमें वचनकी और मनकी तत्काल अविचारपूर्वक प्रवृत्ति होना इसको सहमातिचार कहना चाहिये.
भयातिचार-एकान्त स्थानमें वसतिका होनेसे सर्प, दुष्ट पशु, चाय वगैरह प्राणी प्रवेश करेंगे इस भयसे वसतिकाके द्वार बंद करना.