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________________ मूलाराधना १७८८ नानाविधासु जातासु लब्धिष्वेष महामनाः ॥ न किंचित्सेवते जातु विरागीमूतमानसः ॥ २१२९ ॥ विजयोदया - उब्वणमाहारय विक्रियादी भाहारकर्यो चारणऋतौ क्षीरास्तथाविलब्धिषु वा तपसोत्पन्नावपि चिरागतया न किंचित्सेवते सः ॥ विनोदारमख--- मूलारावणविक्रियाविधः आहारय आहारफलाधिः । चारण आकाशगमनलब्धिः । खीरासनादि क्षीरसावित्यमधुस्रावित्यादिकवयः ॥ अर्थ - तपके द्वारा वैकिविक ऋद्धि, आहारक ऋद्धि, चारण ऋद्धि, क्षीरास्रावित्वादि लब्धि प्राप्त होनेपर मी विरक्तता युक्त परिणाम होनेसे थे उनका सेवन नहीं करते हैं. अर्थात उसका उपयोग नहीं करते हैं. दीनामपि ॥ मोणाभिम्गहणिरदो रोगादंकादिवेदणाहेदुं । ण कुणदि पडिकारं सो तहेव तण्हाछुहादीणं ॥ २०५९ ॥ daarai प्रतीकारं क्षुदादीनां च धीरधीः ॥ न जातु कुरुते किंचिन्मौनव्रतमवस्थितः ॥ २१३० ॥ विजयोदया - मोणाभिग्नइणिरदो मौनव्रतोपपन्नः रोगातका विवेदनानिमित्तं प्रतीकारं न करोति तथैव दडा रागद्यप्रतीकारमपि तस्याह--- मूलारा - मोणाभिन्न मौनस्वीकारः ॥ अर्थ -- मौन व्रतको धारण करते हैं. रोगादिकोंसे पीडा होने पर उनका प्रतीकार इलाज नहीं करते हैं. भूख, प्यास, श्रीत, उष्ण, इत्यादिकों का भी वे प्रतीकार नहीं करते हैं उवएसो पुण आइरियाणं इंगिणिगदो वि छिष्णकधो ॥ देवे माणुसेहिं व पुडो धम्मं कधेदित्ति ॥ २०६० ॥ आश्वास ८ १७८८
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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