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________________ HAMASTARAMATKARS मृलाराधना आश्वास PICS जाव ण वाया खिप्पदि बलं च विरियं च जाव कायम्मि ॥ तिन्वारा वेदणाए जाव य चित्त विक्ख ॥ २०१९॥ यावन्न क्षीयते वाणी यावर्दिद्रियपाटयम् । यावद्वैये पलं चेष्टा हेयादेयविवेचनम् ॥ २०९२ ।। विजयोदया-जाय ण वाया खिप्पदि यदि यायद्वारा विनश्यति बलं वीयं च यावदस्ति काये तीवया वेदनया वापधित्तं न व्याक्षिप्तं भवति तावत् ॥ तत्क्षणे मुमुक्षुणा यत्करणीय तदुपदिशतिमूलारा--क्खिापदि विनश्यति । विविण्यात व्याक्षिप्तम् । अर्थ--जबतक वचन मुंहसे निकलता है. जबतक शरीरमें बल और वीर्य है और जबतक शरीरमें होनेवाली तीव्र वेदनासे चित्त आकुलित नहीं हुआ है तबतक aree णच्चा संबट्टिग्ज तमाउगं सिग्यमेव तो भिक्खू ॥ गणियादीण सण्णिहिदाणं आलोचए सम्मं ॥ २०२०॥ तावद्वेदनया ज्ञास्या न्हियमाणं स्पजीवितम् ॥ आलोधनां गुरोः कृत्वा धीरा मुंघन्ति विग्रहम् ।। २०९३ ॥ चिजयोदया–च्चा संवट्टि शास्वोपसनियमाणमायुः शीघ्रमेव ततो भिक्षुराचार्यादीनां सशिवितानामा. लोचनां सम्यक कुर्यात् रत्नत्रयाराधनायां परिणतः व्युस्सओत् घसति, संस्तरमाहारमुपधि शरीरं परिचारकान्, बलवीर्य हानेः पराणगमनासमर्थः । निरुतः प्रवेशं प्रकर्षण नियति निरुद्धतरक इत्युच्यते ॥ मूलारा--संवट्टितं उपसज्यिमार्ण । तीबवेवनायां अन्तर्मुहूर्त्तमात्रभोग्यदशायां प्रवेशमाने || तो ततः । आयुरप्रवर्तनाचतो: आचार्यादीनाममे ॥ अर्थ-तबतक अपना आयुष्य प्रतिसमयमें क्षीण हो रहा है ऐसा जानकर आचार्यादिकोंके पास शीघ्र अपने संपूर्ण पूर्व दोषोंकी आलोचना करनी चाहिये. रस्नत्रयाराधनामें तत्पर होकर वसति, संस्तर आहार, उपधि, १७६७
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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