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________________ काराधना आश्वास सेव्यते क्षपको येन शक्तितो भक्तितः सदा ॥ तस्याप्याराधना देवी प्रत्यक्षा जायते मृतौ ।। २०८२ ॥ विजयोदया-झो ओलम्पादि आराधयं यस्सयते माराधकं सदा तीवभक्तिसंयुक्तः, संपद्यते निर्षिना तस्याप्याराधना सकला। क्षपकोपास्तिफलमनुशास्ति ---- मूलारा--ओलगइ सेवते ॥ अर्थ-जो भव्य जीव क्षपक की उपासना करता है. अंतःकरण में तीवभक्ति धारण करता है. उसको भी संपूर्ण आराधनाए प्राप्त होती है. सविचारभत्तबोसरणमेवमुक्वण्णिदं सबित्थारं ।। अविचारभत्तपच्चक्खाण एतो परं धुच्छं ।। २०१०॥ भक्तत्यागः सबाचीरो विस्तरेणेति वर्णितः ॥ अधना तमवीचार वर्णयामि समासतः ॥ २०८३ ॥ भक्तत्यागः । वित्रयोदया-विचारतवोसरण सविचारभनमत्यारापानमयमुपण सविस्तरं अषिचारमकप्रत्याख्यान अनः परं प्रवक्ष्यामि। प्रकृतोपसंहार पुरःसरं अवीचारभक्तप्रत्याख्यानं व्याख्यातुमपक्षिपतिमूलारा-एतो इतः। इति सविचारभक्तप्रत्याख्यानध्याख्यान समाप्तम् ।। अर्थ-इस प्रकार सविचार भक्तप्रत्याख्यान का हमने सविस्तर वर्णन किया है. अब यहाँसे अवीचार | भक्त प्रत्याख्यानका वर्णन करते हैं. . तत्थ अविचारभत्तपइण्णा मरणम्मि होइ आगाढो । अपरक्कम्मरस मुणिणो कालम्मि असंपुहुत्तम्मि ॥ २११॥ १७६१
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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