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मूलाराधना
आधासः
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विजयोदया-तेग पर संस्थाप्य तेन मृतकेन संरतरपंधात्ततो मृतकबंधनं कृत्या प्रामाभिमुख शिर त्या उस्थानरक्षणार्थ ॥
मस कनिष्कासन विधानं गाथात्रयेणाह
मुलारा-तेण परं शिविकानिष्पादनानंतरं । संठायिय शिबिकायां प्रवेश्य । बंधिसा संस्तरेण समं पद्भवेत्यर्थः। उन्हें तरक्वणळू सत्तिष्ठतो मृतकस्य निवारणार्थ भन्यथा शिरसि कृते कदायित्तत्तिविति भावः । गार्म तत्तो प्रामाभिमुखे ।।
____ अर्थ-शिक्षिकाकी रचना करनेके अनंतर बिछाने के साथ उस शवको बांधकर शिविका में उसको सुलाना चाहिये. ग्रामके सन्मुख उसका मस्तक करना चाहिये. प्रामके सम्मुख ही मस्तक करनेका कारण यह है कि कदाचित् वह उठेगा तो उसका मुख ग्रामके तरफ नहीं होगा. और ग्रामके तरफ पैर करके शिविका स्थापन करनेसे बह उरनेपर ग्राममें प्रवेश करेगा इसलिये ग्रामके तरफ सिर करनेका विधान लिखा है.
पुव्वाभोगिय मग्गेण आसु गच्छति तं समादाय ॥ अछिदमणियत्तता य स्ट्रिदो ते अणिम्भता ।। १९८१ ।। क्षिप्रमादाय गच्छति चीक्षितेनाध्वना पुरा॥
निवर्तनमवस्थानं त्यक्त्वा पूर्वावलोकनम् ॥ २०५८ ।। विजयोदया-पुवामोनियमाण पूर्भालोकितन मार्गग आशु गम्छंति तासमादाय अस्थित अनिधर्तमानाः गृएत आन्दोकन मुक्या ।
मूलारा --स्वाभोगिय प्राग्रमा । अलि अविभाअणियत्ततो अमानतः पहिदी पृष्ठतः । अणि तो अनालोकमानाः । उर्फ च
संस्तरेण सभ घद्ध्वा मृतक विधिना हवं ।। विधायोत्थानरक्षार्थ ग्रामस्थाभिमुन्य शिरः ।। भिप्रमादाय गच्छंति वीभितेनावना पुरा ।।
निवर्तनमवस्थानं त्यक्त्वा पूर्वावलो फनम् ।। ___अर्थ-पूर्वसे देखे हुए मार्गसे वह शब शीघ्र लेकर जाना चाहिय. रास्ते न खडे होना चाहिंय न पीछे । लोटकर देखना भी चाहिये.