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________________ मूलाराधना १६०८ विजयोदया- दुकं अतखुत्तो पायेसु सुईदि पावदि कवि दुःखमपि नेतारं प्राप्य सुखमपि प्राप्नोति कथं । तवि य अनंतखुचो तथाप्यनंतधारं सम्वाणि सुखाणि पक्षाणि सर्वाणि सुखानि प्राप्तानि || गणतां चक घर्तिनां पंचानुत्तर विमानयासिनां लोकांतिकानामहमिद्राणां च सुखानि मुक्त्वा ॥ मूळारा-सम्बाणि गणधृत, चक्रवर्तिनां अनुविज्ञानुत्तरविमानवासिनां लोकांतिकादीनां च सुखानि मुक्त्वा ॥ अर्थ -- इस संसार में गणधर नारायण, प्रतिनारायण चक्रवर्ती, पंचानुत्तर निमानवासि देव, और लोकोंfar देव इनके सुखोंकी इन जीवोंकी प्राप्ति नहीं हुई है. बाकी के संपूर्ण सुखांक प्रकार इन जीवांको अनंतकार प्राप्त हुये हैं. करणेहि होदि विमल बहुसो वचिचिचसोदणित्तेहि ॥ घाण य जिम्मा चिह्नाबलविरियजोगेहिं ॥ १७८७ ॥ स चतुर्भिस्त्रिभिभ्यामेकेनाक्षेण वर्जिनः ॥ संसारसागरेऽनंत जायते ऽनन्तशोऽसुमान् ।। १८५७ ।। विजयोदया करणेहिं होषि विगलो बिकलेंद्रियः कचिद्भवति । बहुलो बहुशः । वत्रित्ति सोदत्तिर्हि मनसा arer श्रोत्रेण नेत्रेण कम्पेन हीनः । स्पर्शनेद्रियवैकल्यस्यासंभवात् तदनुपन्यासः ॥ घणय घ्राणेन च। जिघ्याए । जिन्हया चेझबलचिरियजोगेहिं वेश्या बलेन वीर्ये च ॥ मूळारा - करणेहिं चितादिभिः कचिद्विकलः स्यात् । स्पर्शनेत्रियस्य वैकल्पासंभवादनुपन्यासः ॥ अर्थ -- यह जीव अनेकवार विकलेंद्रिय हुआ है. कभी नेत्र रहित, कभी कान रहित हुआ था. कभी असज्ञी मन रहित और वचन रहित हुआ था. कभी इसको नाककी प्राप्ति नहीं हुई और कभी इसको शक्ति, बल: पराक्रम इससे रहित होना पडा था. ऐसी अनेक दुरवस्थायें इस जीवकी अनंत बार हुई हैं जबहिरमूओ छादो तिसिओ वणे व एयाई ॥ म सुचिरपि जीवो जम्मवणे णसिद्धिपहो । १७८८ ॥ आश्वास ७ १६०८
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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