SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 1530
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ नलाराधना आभासा क्षपक शरीरादिकोंका त्याग करता है इस विषयका विवचन-- अर्थ-संपूर्ण रत्नत्रययर आरूढ होकर यह क्षपक वसतिका, तणादिकका संस्तर, पानाहार. अर्थात् जल पान, पिच्छ, शरीर और वैयावृत्य करनेवाले परिचारक मुनि इनका निर्मोह होकर त्याग करता हैं. अवहट्ट कायजोगे व विप्पओगे य तत्थ सो सत्वे ॥ सुद्धे मणप्पओगे होइ णिरुद्धझवसियप्पा ॥ १६९४ ॥ निराकृत्य बचोयोगं काययोग च सर्वथा।। स विशद मनोयोग स्थिरात्मा व्यवतिष्ठत ।।१७६१ ।। विजयोदया-अवकागजोगे वाम्योनान्काययोगांश्च सर्वान्निराकृत्य असावत्र मनोयोगे शुद्ध स्थितो भवति । विषयांतरसंचारान्निरुई अध्यवसितंच आस्मरूपतानाचं यस्य सः॥ मलारा--अवहट्ट निराकृत्व । यविष्पोगो वाग्व्यापारान् । तत्थ तस्मिम्मरणक्षणे । सो समत्वमारूढः । सुद्धे रागद्वे पमोहरहिते भनोयोग स्थितो भवति ।। णिरुद्धमानसिदप्पा निराद्धो विषयान्तरसंचारायवर्तितोऽध्यवसितश्च युक्त्युदर्कवितर्केण निश्चित आत्मा स्वरूपं जानाख्य येन स तथाभूतः सन् । उक्तं च समस्तान्कायवाग्योगाधिरस्यैकन संस्थितः ॥ __मनोयोगेऽस्ति संरुद्धनिश्चितात्मस्वरूपकः ।। अर्थ-वाग्योग और काययोग का पूर्ण त्याग कर अर्थात् शरीरकी प्रवृत्ति और घोलना बंदकर शुद्ध | मनोयोगमें निश्चल होता है. उसके मनसे इतर विषयाँका विचार हट जाता है और आत्मस्वरूप का विचार ही स्थान पाता है. एवं सव्वत्थेसु वि समभावं उवगओ विसुद्धप्पा ॥ मित्ती करुणं मुदिदमुवेर्ख खवओ पुण उवेदि ॥ १६९५ ।। समत्वमिति सर्वत्र प्रपद्यामलमानसः ॥ स मैत्रीकरुणोपेक्षामुदिताः प्रतिपयते ॥ १७६२ ॥ EPFOOTALABETESTIMOTASSNEERINDAS4 १५१५
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy