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________________ मूलाराधना आश्वास ७ गुर्षी यद्यपि पीडास्ति प्रकृष्टा मारणान्तिकी । तथापि क्षपको याति सर्वत्र समचित्तताम् ॥ १७५७॥ पिजयोदया-जदि वि य से यद्यपि तस्य क्षपकस्य चरमकालांते मारणांतिकं दुःख भवेत् सो कवचेनोपगृहीतः क्षपकः सथापि असमूढः समभावं सर्वत्रोपैति ।। मारणांतिकेऽपि दुःख समुदीणे कवचोपगृहीतः साम्यात्र प्रच्यवते इति कवचानुभाष भावयति मूलारा-से करचोपगृहीतस्य क्षपक्रस्य । परिभते चरमकालांते । मारणतिय भरणं यावनोग्यं तथाविधास:योदयसंपादात्वान । आसाद दुःख । असमूहो हारी रामप्यनुत्पत्रात्मख्यातिः ॥ __ अर्थ-यद्यपि उस क्षपकको अंतसमय में मरण प्राप्त होनेतक दुःख होगा तो भी कवचमे युक्त होनेपर बह माहरहित होजाता है. देह और आत्माको भिन्नताका उसको सम्यग्ज्ञान हुआ है अतः वह सर्व देहादिक वस्तुआम समभाव धारण करता है. एवं सुभाविदप्पा विहरइ सो जावबीरियं काये ॥ उहाणे सयणे वा णिसीयणे वा अपरिदतो ॥ १६९१ ।। एवं भाक्तिचारित्रो यावदीयं कलेवरे॥ तावत्प्रवर्तते साधुरुत्थाय शयनादिषु ॥ १७५८ ।। विजयोवया-पवं सुभाषिप्पा निर्यापन सुरिणा गदितोर्थ रयमित्युच्यते । तेन सम्यग्भाषितचित्तः सन्धिहरदि प्रवर्तत अपरिश्रांतः । जायचीरियं काये याबच्छरीरे बलमस्ति उत्थाने, शयने आसने धा। निर्यापकसरिनिरूपितार्थसम्यग्भावितचित्तस्य सर्वत्र खेदाभावं यावदेहबळमभिलपति मूलारा--एवं गुरूक्तार्थेन । सुभाषिदप्पा सम्परभावितः सन् विहरति । सयणे शयने । णिसीयणे उपवेशने । अपरिदंतो अपरिश्रांतः ॥ अर्थ-इस प्रकार निर्यापकाचार्यके कहे हुए उपदेशसे जिसने पदाथोंका स्वरूप जानकर अपने आत्माको सुसंस्कृत बनाया है ऐसा वह क्षपक जब तक देहमें सामर्थ्य रहता है तबतक ऊठना, सोना, और बैठना इन क्रियाओंमें न थका हुआ प्रवृत्ति करता है.
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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