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________________ आभास पलाराधना காது பாபாபாகாதாதாம் संक्लेशस्य नैरी क्यप्रकटनार्थोत्तरा गाथा हदशकास मुहीहि हो तह कडिया तुसा होति ॥ सिगदाओ पीलिदाओ धुसिलिदमुदयं च होइ जहा ॥ १६२५ ॥ इतं मुष्टिभिराकारा चिहितं तुषखंडनम् ॥ सलिलं मथितं तेन संक्लेशो येन सेवितः॥ १६५० ॥ विजयोवरमा हदमागासं तं मुधिभिराकाशं ताडितं । तुषकंचन तंडलाय । सिकतापीड़नं तिलयं तैलार्थ । जलमंघम च घृतार्श: यथापार्थक तथानर्थकः सनशो वेदनाकुलस्य । मेदनायाः अनिराकरणत्वानरर्थक्यसाम्यादभेदोपन्यासो रशन्तदाएं न्तिकयोः॥ बेदनाफु लस्य संचलेश्वैय्यर्थ्यसमर्थनार्थ चतुरो दृष्टांतानाचष्टे मूलारा-इदं अपकारकाभिभवाय ताडितं । कडिदा तंबुलार्थ कुट्टिताः । पीलिदाओ तिलयंत्रे निक्षिप्य तैलार्थ चूर्णितः । घुसिलि दमुदयं मधितमुदकं घृतार्थ । तेन येन वेदनाशात्यर्थ संक्लेशः कृत इति संबंधः । तं तत । यतः संक्लेहानेदनोपसमादिः पुण्यबंधादिर्धा प्रत्युत तिर्यगायुबंधः स्यात् । उक्त च--- हतं मुष्टिभिराकाशं विहित तुपकंडनं ॥ सलिलं मथिनं तेन संक्लेशो येन सेवितः ।। अर्थ-जैसे आकाशको मुडिओसे मारना, तंडुलोंके लिये भूसा कूटना, तैलके लिये चालु को यंत्रसे पीसना और धीके लिये जलका मंथन करना जैसा व्यर्थ है बैंसा दुःखनिराकरणके लिये संकेशपरिणाम उत्पन्न करना व्यर्थ है, क्यों कि वेदनाकुल मनुष्योंके वेदनाओंका परिहार करने में सक्लेश परिणाम असमर्थ हैं. यहां दृष्टांत आकाशादिकको कूटना और दान्ति संक्शपरिणाम इन दोनों में साम्य दिखाया है. निरर्थकतारूप धर्म दोनो में होनेन साम्य स्पष्ट है. । पुव्व सयमुवभुत्तं काले णाएण तेत्तियं दध्वं ।। को धारणीओ धणिदस्स देतओ दुक्खिओ होम्ज ॥ १६२५ ॥ RECER
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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