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________________ बलाराधना आधार वेदना उनको नहीं अनुसरती है. प्रत्युत बह मंद होती हैं. क्योंकि यह भावना असातावेदनीय कर्म का रस मंद करती है. असंयमसे असातावेदनीय कर्मका अनुभव तीव्र बनता है. आचार्य उमास्वामी महाराजने ' दुःखशोकतापानंदनवधपरिदेवनान्यात्मपरोभयस्थान्यसदेद्यस्य ' इस सूत्रमें असाता वेदनीय कर्मके कारणोंका-दुःख शोक बगैरर कारों का जान लिया है. ण करेंति णिन्वुई इच्छया वि देवा सइंदिया सब्बे ॥ परिसस्स पावकम्मे अणवक्रमगे उदिण्णम्मि!! १६१५ ॥ कक्षितोऽपि न जीवस्य पापकर्मीदये क्षमाः ।। वदेनोपशमं कर्तुं त्रिदशाः सपुरंदराः ॥ १६७९ ।। विजयोदया- करति णिवुन कुर्वन्ति निवृतिं । पुरिसस्स पुरुषस्य । सईदिया देवा सम्बे इच्छया वि सद्रकाः सर्वे देवा इच्छतोऽपि । पावकम्मे पापकर्मणि । अणुक्कमगे अनुक्रम के दिण्यास्मि उदयमुपगते ॥ न च कालेन पच्यमाने दुनियारे असोधकर्मणीदादयोऽपि पुरुष सुखयितुं प्रभवतीत्युपदिशतिमूलारा—इच्छगा बि वेदनां निराकर्तुमिच्छतोऽपि । अणवक्रमगे निष्पतिकारे । उक्तं च-- न कुर्वति सुराः सर्वे प्रसन्ना अपि नियंतिम् ।। पापकर्मोदये पुंसः सत्येव निरुपक्रमे ।। अपि च ॥ काभतोऽपि न जीवस्य पापकर्मोदये क्षमाः ।। घेदनोपशम कतु त्रिदशाः सपुरंदराः ॥ अर्थ-जब पाप कर्मका उदय घुरुपको क्रमसे आता है तब सत्र देव मिलकर भी उस पुरुषको सुखी बना नहीं सकते हैं. सुखी बनाने की तीन इच्छा होनेपरमी वे उसको सुख देने में असमर्थ होते हैं. किह पुण अण्णो काहिदि उदिण्णकम्मरस णिव्युदि पुरिसो ॥ हत्थीहिं अतीरं तं भतुं भंजिहिदि किह ससओ ॥ १६१६ १४६८ . . . - - - - - ."
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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