SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 1482
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आश्वास . १लागधना मोक्खाभिलासिणो संजदरस णिधणगमणं पि होदि वरं ॥ ण य वेदणाणिमित्त अप्पासुगसेवर्णकादं ॥ १६१३ ॥ संयतस्य वरं साधोरणं मोक्षकांक्षिणः ॥ वेवनोपशमं कर्तुं नापासुकनिषेवणम् ।। ६७७ ॥ विजयोदया-मोक्वाभिलासिणो निरवशेषकर्मापायाभिलाषिणः। संजवस्स प्राणसंयमवतः ।णिधगमणं पि होदि पर मरणमपि वरं । य नैव वरं । वेदणाणिमित वेदनोपशमाथें । अप्पासुगसेषणं कार्य भयोग्यद्रव्यसेवन कतम् ॥ मूलारा--बेदणाणिमित्तं वेदनोपशमनार्थम् ॥ अर्थ-संपूर्ण कर्मक विनाशकी अभिलाषा करनेवाले मुनि मरणको भी अच्छा समझते हैं. परंतु वेदना के उपशमके लिए अयोग्य व्यका सेवन नहीं करते है. अर्थात् संयम पालकर योग्य प्रासुक औषध मिलेगा तो लेते है अन्यथा न णिघणगमो एयभबे णासो ण पुणो पुरिछजम्मेसु ॥ जाणं असंजमो पुण कुइ भवसएम बहुगेसू ।। १६१४ ।। एकत्र निधनं नाशो न तु भाषिपु जन्मसु असंयमः पुननांश दत्त रहुपु जन्मम् ।। १७७८ ।। विजयोट्या-पियनगमो प्रयभव निधनगननक भये । णासो ण पुणो न पुननांशः । पुरिल्ल जम्मसु भाविषु जन्मसु । संजमो पुण असंगमः पुनः । भवसएर जन्मशतेषु । वापनु बहुपु । गाल कुणह माशं करोति । वेदनाहि न संयतमनुयाति रत्नत्रयमावनोद्यसं । सावि मसाले मंद करोति । भसंयमा पुन असद्ध प्रकृयानुभवं करोति : जकंचदुःमाशोकतापादनवधपरिदेवनान्यात्मपोभयभ्याम्धनद्धेहास्येति ।। वेदनामरणादलयमेन तत्प्रतिकारो:त्यर्धमपश्य इत्या --- मूलारा-णासो अभाव: पुरिल अमेतनेषु ।। अर्थ-मरणरूप नाश एक भवमें ही होगा परंतु वह नाश नहीं हैं. क्योंकि उससे आत्माका अहित होता नहीं है. परंतु असंयमाचरणसे भाचि सैकडो जन्मोका नाश होता है. जो मुनि रत्नत्रय भावनामें तत्पर रहते हैं १४६७
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy