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________________ आश्वासः भूलाराधना अमी तपोधनाः माता स्वार्धमेकाकिनो यदि ॥ अध्यास्प वेबमास्तमाः निःप्रतीकारविग्रहाः । १६१७॥ विजयोदया-शदिवा पर्व यदि तावदेवमेते यतयस्तीबवेवनापीडिता अपि एकाकिनोऽप्रतीकारा उत्तमार्थ प्रतिपन्नाः ॥ मूलाय-एगागी एकाफिनोऽसहायाः ॥ अर्थ- यदि ये उपयुक्त दृष्टोतरूप निओने तीन वेदनाओंस पीडित होकर भी अकेले ही ती वेदनाका कुछभी इलाज नहीं किया. और उत्तमार्थ की अर्थात रत्ननगराधना की प्रापि की. किं पुण अणयारसहायगेण कीरंतयम्मि पडिकम्मे ॥ संघे ओलागते आराधेदुं ण सकेज ॥ १५५९ ॥ चतुर्यिधेन संधन विनीसेन निषितः ।। तदारायसे न त्वं देवीमाराधनां कथम् ॥ १६१८ ।। विजयोदया–कि पूण मणगार सहायगेण किं पुनर्ग शक्यते आराधयितुं मनगारसहायन भयता क्रियमाणे प्रति कारे संघे चोपालमां कुर्चति समि ॥ मूलारा-ओलयांतो पपासना कुर्वति सति । ण संकेज न शक्येत त्वया ॥ अर्थ-हे क्षपक तुम तो अनक मनिओंकी सहायतासे युक्त हो और तुलारी तीव्र वेदनाका इलाजभी हो रहा है. संघ अनेक मुनि भी तुझारी शुश्रूषा करते हैं. अतः तुम आराधना देवीकी भक्ति क्यों नहीं करते हो? जिणवयणममिदभूदं महुरं कण्णाहुदि सूर्णतेण ॥ सका हु संघमज्जे साहे, उत्तम अह ॥ १५६० ॥ कर्णाजलिपुटः पीत्वा जिनेंद्रय चनामृतम् ॥ संघमध्य स्थितः शक्तः स्वार्थ साधयितुं मुम्बम् ।। १६१९ ।।
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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