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________________ लाराधना आश्वासः संसारस्याविषधन ग्रीस्येवमास्थता तापेन नप्यमानस्य तरो धारागृहायते ।। १५२१ ।। _ विजयोदगा-संसारमहाडाण संसारमहादान वह्यमानस्य तपो भयप्ति जलगृहं । यथा दयमानस्य सूर्याशु. मिर्धारागृहं । संसारिकतुःखनिर्मूलनकारिता तपसोऽनेन सुच्यते ॥ मूलारा--सीधरं धारागृहम् । तीप्रभीष्मार्करश्मिकृततापस्येव संसारमहादुःखस्य निर्मूलकत्वात् ॥ अर्थ-जैसे सूर्य के प्रबंट किरणोसे संतस मनुष्य का शरीरदाह धारागृहसे नष्ट होता है वैसे संसारके महादाहसे दग्ध होनेवाले भव्योंके लिये तप जलगृहके समान शांति देनेवाला है. तपमें संसारिक दुःख निर्मुलन करना यह गुण है ऐसा यह गाथा कहती है, .. जीयल्लओ व सतबेण होइ लोगस्स सुप्पिओ पुरिसो ॥ भायाव होइ विस्ससणिज्जो मुतवेण लोगस्स ॥ १४६३ ॥ चिदधानस्तो भक्त्या निरालस्यो विधानतः ॥ देशांतरमपि प्राप्तः स बंधुरिव गृह्यते ।। १५२२ ॥ विजयोदया-पायल्लओ व बंधुरिव लोकस्य नितरां प्रियो भवति पुरुषः। शोमनेन तपसा सर्यजगप्रियता करोति तपस्यनेन यास्यातं भवति । मादाय होइ चिस्ससणिज्जो मात्र विश्वसनीयो भवति लोकस्य । सर्वजगदिश्वास्यत्वं तपःसंपाद्यमनन कथ्यते ॥ मृलाग-- स्पष्टम ॥ अर्थ- उत्तम तप करनेस तपस्वी मुनि-पुरुष बंधुके समान सर्व लोगोंको अतिशय प्रिय होता है. उत्तम तप सर्व जगयियता प्रा होती है ऐसा इस गाथासे सिद्ध होता है. माताके समान तप करनेवाला सर्व लोगोंको विश्वसनीय होता है, तपका सर्व जगद्विश्वसनीयता गुण इस गाथासे कहा गया है. कल्लाणिढिसुहाई जावदियाइं हवे सुरणराणं ॥ जं परमणिबुदिसुहं व ताणि सुतवेण लब्भति ॥ १५६४ ॥ -
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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