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________________ मूलाराधना आश्वास १३.७४ तपोमाहात्म्यमाइ मूलारा-पूजादि आदिशब्देन अध्यापतिशयक्रिीयादि ।। आवजिजति प्रणाम कार्यते। अन्ये आकंपि. इति पठित्वा अनोभमुपयांतीत्यर्थमाहुः । सइंदिया सेन्द्राः॥ तपगुणका निरूपण करने के लिए उत्तर प्रबंध-- अर्थ-इह लोकमें और परलोकमें निरतिचार तप करने से आत्मामें अतिशय-ऋद्धि प्राप्त होती है और सर्वत्र महादर भी होता है. तप के माहात्म्यसे इंद्रादिक देव भी नम्र होते हैं. . अप्पो वि तवो बहुगं कल्लाण फलइ सुप्पओगकदो ॥ जह अणं बडबीअं फलइ वडमणेयपारोहं ॥ १४५९ ॥ तपः फलति कल्याण कृतमल्पमपि स्फुटम् ।। बहुशाग्योपशाखाख्यं वटवीजे यथा बटम् ॥ १५१८ ।। विजयोदया-प्रपयोधिती अल्पमपि तपः महाकल्याणं फलति सुसंयमनिष्पन्नं । सुष्टु प्रयुज्यते प्रवत्यंत नेनेति च विग्रहे मग्रमः सुप्रयोगशब्दनोच्यते । यथा शल्पमपि वटबीज फलति वटमनकारोई अल्पमपि पृथुलं फलदायितपः इत्येतदाख्यातमनया मूलारा-सुष्पओगकदो यथाशक्ति संयमेनाचरितम् । निदानासंयमरहितमिति वा । फलदि जनयति । अणेयपारोह अनेकप्रराहेम् ।। अर्थ-अल्प तपश्चरणसे भी महा कल्याण होता है. संयम की भी उत्तम-निर्दोष सिद्धि होती है. जैसे सूक्ष्म वटचीज अनेक शाखाओंसे युक्त महान वटवृक्षको जन्म देता है. वैसे अल्प तप भी विपुल फल-स्वादिक सुखको उत्पन्न करता है. १३७४ सुष्टु कदाण वि सरसादीणं विग्धा हवंति अदिबहुगा ।। सुख कदस्त तवस्स पुण पत्थि कोइ विजए विग्यो ॥ १४६०॥
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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