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________________ लाराधना आश्वास १३५० न करुणात्मक विचार कठोर रोषको दूर करता है अर्थ-यदि मेरेमें दोष है और इसने मेरे सत्य दोषोंका कथन किया है तो भी इसके ऊपर क्षमा करना मेरा कर्तव्य है. इसने जो दोष कहा है वह मेरा है ही. इसने असत्य तो कहा ही नहीं ऐसा विचार कर क्षमा करनी चाहिए. विद्यमान दोषोंको कोई कहे तो क्या वे नष्ट होजाते हैं ! ) गो गा समुस्का मति मोतिसरा मां सहते इति प्रसियमेष लोके इति कथयति सत्तो वि ण चेव हदो हदो वि ण य मारिदो ति य खमेज्ज ॥ मारिज्जतो विसहेज्ज चेव धम्मो ण णोत्ति ॥ १४२२ ॥ ) शप्तोऽस्मि न हतोऽनेन निहतोऽस्मि न मारितः ।। मरणेऽपि न मे धर्मो नश्यतीति विषयते ॥ १४७९ ।। विजयोदया-सत्तो व शप्त एवास न हतः इत्यहनन गुणं पृथु खेतसि संस्थाप्य किमोन शपनेन मे भष्टमिति क्षम्तव्यं । पमितरत्रापि योज्यं । हत एष न मृत्यु प्रापितः । मार्यमाणोऽपि सहेत विपत्रिमूर्लनक्षमोऽभिलषितमुखसंपापमोचतो धर्मो न विनाशित इति। यो यदीयं महांत उपकारं विसे करोति स तदीयमल्पमपराधं सहते इति लोकप्रसिद्धेनैव मार्गण क्रोधान्यायति-- मूलारा-सत्तोम्हि चेष शप्त एवास्मि । ण हदो न कशादिभिस्ताडितः । एवमहननं महोतं गुणे चेतसि संस्थाप्य किमनेनास्य शपनेन मम नष्टम् । यावन्न ताडयतीति षा आक्रोधरि क्षमा कुर्यात् । एवमुत्तरत्रापि योज्यम । धम्मो समस्तविपदपसारणप्रवणः सकलमुखसंपादनोदातो वृषो ममानेन न नाशित इति ॥ ( जो जिसके ऊपर महान उपचार करता है वह उसका अल्प अपराध सहता है. यह लोकोक्ति जगतमें प्रसिद्ध ही है. इसीका विवेचर अर्थ-इसने मेरे को मालीही दी है. इसने मेरे को पीटा तो नहीं है. अर्थात न मारना यह इसमें महान् गुण है इसने गालि दी है परंतु गालि देने से मेरा तो कुछ भी नुकसान नहीं हुआ अतः इसके ऊपर क्षमा करना ही मेरे लिए उचित है. ऐसा विचार कर क्षमा करनी चाहिए. इसने मेरे को फक्त तादन ही किया है. मेरा वध तो १३५
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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