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________________ "लाराधना आश्वासः सुमरणपुंखा चिंतागा विसयविसलित्तरइधारा ॥ मणधणुमुक्का इंदियकंडा विधति पुरिसमयं ॥ ११९९ ॥ हर्षीकमार्गणास्तीक्ष्णाचिसापुरवाः स्मृतिस्यदाः ।। नरं मनोधनुर्मुक्ता विध्यति सुवहारिणः ॥ १४५५ ॥ विजयोन्या-सुमरणपुंग्या स्मरणपुंखा, चिताधेगा विषयविषण लिप्ता रतिधारा येषां ते मनोधन का रनियवाणाः पुरुषमृग घातयन्ति | इंद्रियनिर्जय गाथाद्वयेनाइ मूलारा--बिसयविसलित्तरविधारा विषयविषण लिप्ता रतिधारा येवो अश विषयशन भोग्यबुदया गृहमाणानां रूपादीनां निर्भासा विवक्षिताः । इंद्रियशब्देन चक्षुरागुपयोगाः । विधेति विध्यन्ति । मए मृगान् ।। अर्थ-स्मरण रूपी पुंख अर्थात् पंख जिनके लगे हैं, चिंता रूप वगसे युक्त, विपयरूपी विपसे लिप्त हुए, रतिधारासे संयुक्त, एसे इंद्रियरूप बाण मनरूप धनुष्यसे घटकर मनुष्य मृगका घात करते हैं. यहां नेत्रादिक इंद्रियों का विषयोंके तरफ जो उपयोग लगना उसको ही इंद्रिय कहना चाहिये. भोग्यबुद्धीस ग्रहण किये रूपरसगंधादिलोंका जो ज्ञान होता है उसको विषय कहते हैं. नाम्याणान्पुरुषगहननोचतास्यतय एव धारयन्तीति कथयति धिदिखेडएहि इंदियकंडे ज्झाणवरसत्तिसंजुत्ता ।। फेडंति समणजोहा सुणाणदिठ्ठीहिं दद्रूण ॥ १४०० ॥ हृषीकमार्गणास्तीक्ष्णा साधुभिर्धतिम्वेटकैः ।। ध्यानसायकमादाय खण्डयन्ते ज्ञानदृष्टिभिः ।। १५१६ ॥ विजयोदया-धिनिखक्षपाहिं पृप्तिखेरै दियशरान्धारयन्ति ध्यानसत्यसमन्विताः। समणजोहा श्रमणयोधाः सभ्यरज्ञानरष्ट्या दृष्ट्वा || मूलारा---धिविखेडएहि संतोषफलकैः । फेडति वारयति ।।
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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