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________________ CAT मुलाराधना आवासः १२९७ मूलारा-पावकरणवेलचं पापकरणमेव विडंबना यस्य तं । पेकछणयकर प्रेक्षणकारिणं हिंसादिपापक्रियाविडयनां प्रेक्षणीयकत्वेन संपादयत पिशाचं करोतीत्यर्थः । उक्तं च-- कथायामपिशाचेन पिशाचीक्रियते नरः॥ सम्मध्ये प्रेक्षणीभूतः कुर्वन्यापबिडमनाम् ॥ अर्थ--इंद्रिय और कषाय रूपी पिशाच मनुष्यको सुजनोंको देखनेलायक हिंसादि पापक्रिया करनेवाला पिशाच बनाता है. जुलजस्स जारामिछचगास गिवणं व यु पुरिसस्स ॥ ण य दिक्खिदेण इंदियकसायवसिएण जेदुजे ॥ १५१३ ॥ संयतस्य कुलीनस्य योगिनो मरणं वरम ।। लोकवयसुखध्वंसिन कषायाक्षपोषणम् ।। १३८१ ।। विजयोदया कुलजस्स पुरिसस्स जस्समिछत्तगस्त कुलप्रसूतस्य पुंसः यशोऽभिप्लाषिणः । णिवणं बरं मृतिः शोभना । ण दु वरं जीविजे व वरं जीवन । विक्खिडेण दियकसायबसिपण दीक्षितस्यैनियकवायघशर्तिनः। जीवमं न शोमनमित्यर्थः ॥ मूलारा-णिधगं मरणं । जीवि, जे जीवितुं । अर्थ--उत्तम कुल में उत्पन्न हुआ तथा यशकी अभिलाषा करनेवाला ऐसे पुरुष का मरना भी अच्छा ही मानना चाहिये. परंतु दीक्षा लेकर पुनः इंद्रिय और कषाय के वश होकर जीना अच्छा नहीं हैं. अभिप्राय यह है. कि, इंद्रिय और कपाय के आधीन होकर जीना यापासबके लिये कारण है अतः ऐसा जीना खराब है. परम्॥ जध सण्णहो पग्गहिदचावकंडो रधी पलायंतो ॥ णिदिज्जदि तध इंदियकसायवसिगो वि पन्धज्जिदो ॥ १३३४ ॥ निंद्यते संयतः सर्वैः कायाक्षवशंगतः ॥ सन्नद्धो घृतकोदडो मश्यन्निव रणांगणे ॥ १३८२ ।। १२९७
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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