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________________ मूलाराधना आश्वास कषायमत्त उन्मत्तः पित्तोन्मत्तोऽपिनो पुनः ॥ प्रमत्तं कुरुते पापं द्वितीयो न तथा स्फुटम् ।। १३७९ ॥ विजयोदया-होदि कसाउम्मत्तो अवयं पवघटना । उम्मत्तो होदि जन्मत्तो भवति यथा । कः ? फसाय उम्मतो कषायोन्मसः । तथा उम्पत्तो होदित्ति पदघटना तथा उन्मत्तो न भवति । कः पित्तउम्मत्तो पित्तोम्मत। पतेन पित्तरुतायुन्मादार कपायकृतस्योन्मादस्य जयन्यता ख्याता । कथे? न कुणी पिनुम्मत्तो पापं न करोति पितो. प्रत्तः । पाप दरो जधुम्मत्तो कायान्मत्तों यथा पापं करोति, तधाभूतं न फराति । गतः पकेकोषिऽपि क्रोधादिः हिसादिषु प्रवर्तयति । कर्मणां स्थितिबंध दीर्शकरोति । विवेकशानमेव तिरस्करोति घिसोन्मादः ततोऽनयोमहदंतरं इति भाव मूलारा...रम्मतो उन्मदात्तः । तध ण तथा न । पित्तोन्मत्तो भवत्युन्मनो यथा कषायोन्मत्त इत्ति संबंधः ॥ अर्थ-जो कषायसे उन्मत्त हुआ है उसको ही वास्तविक उन्मत कहना चाहिये. परंतु जो पित्तसे उन्मत्त हुआ है वह वास्तविक उन्मत्त नहीं है. पित्तसे जो उन्माद उत्पन्न होता है उससे भी कषायोन्माद अतिशय तीव्र है. और दुःखदायक है. पिचोन्मत्त मनुष्य पाप नहीं करता है परंतु कषायोन्मत्तमनुष्य पाप करता है. अर्थात् पित्तोन्मत्त मनुष्यसे कषायोन्मत्त मनुष्य महान् अन्याय करता है. एकेकभी क्रोधादिक कषाय हिंसादिक पापों में जीवको प्रवृत्त करता हैं. कर्मका स्थितिबंध उत्तरोत्तर दीर्घ करता है. परंतु पित्तोन्माद फक्त विवेक ज्ञानको ही नष्ट करता है उससे हिंसादिक पाप और कर्मकी दीप स्थिति नहीं होती है. अतः इन दोनोंमें महान् अंतर है. इंदियकसायमइओ गरं पिसायं करंति हु पिसाया ॥ पाबकरणवेलंबं पेञ्छणयकर मुयणमझे ॥ १३३२ ॥ कषायाचपिशाचन पिशाचीक्रियते जनः ॥ जनानां प्रेक्षणीभूतस्तीवपापकियोद्यतः ।। १५८० ॥ पिजयोदया-इदियकसायमालो इंद्रियकरायमयः पिशाचः । णरं पिसायं फरेवि नरं पिशाचं करोति । कीररभूतं पिशाचं करोति ? सुजणमो पेच्छणयकरं सुजनमध्ये प्रेक्षणिककारण | पावकरणलं हिंसादिपापकिया'विलंबनां प्रक्षणीयत्वेन संपादयन्त पिशाचं करोतीति यावत् ॥ BretenegranAmARA
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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