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________________ आश्वान ततोऽपथेन धावन्तः कुशीलानां क्रियावने ॥ पुकाराधना केशस्रोतोभिरुद्यो याताः संज्ञामहानदीः॥ १३४७ ।। विजयोदया-तो ततः साधुसादगदपस्ताः , कुसीलपडिसेयणायणे कुशीलप्रतिसबनावने , उप्पण धावता उन्मार्गण पलायन्तः । सपणापदीसु संज्ञानदीपु । पखिदा पतिताः । फिलससोनेण क्लेशस्रोतसा | बुदस्ति ते बुडंति ॥ मूलारा-ते साधुसार्थाइरापमृताः 11 मण्णा आहारभयमैथुनपरियवांछां । युज्झन्ति उद्यते 11 अर्थ-साधसास दर पलायन जिन्होंने किया है ऐसे वे मुनि कुशील प्रतिसेवना-कुशील नामक भ्रष्ट II मुनिक सदोष आचरणरूष बनमें उन्मार्गस भागते हुए आहार. भय, मधुन और परिग्रहकी वांछारूप नदीमें पड़कर दुःखरूप प्रवाहमें डूबते हैं. सण्णाणदीसु ऊढ़ा बुड्डा थाहं कपि अलहंता ॥ तो ते संसारोदधिमदंति बदक्खभीसम्मि || १३० ।। संज्ञानदीषु से मना क्वचिदप्यनवस्थिताः ।। पश्चाजन्मोदधिं यांति दुःखभीमसषाकुलम् ।। १३४८ ।। विजयोदया सगणाणदीसु ऊढा संज्ञानदीभिराकष्टाः संतो निर्भग्नाः । तो पश्चाम् । संसारोदधिमति संसार सागरं प्रविशति । बहुदुक्खभीसम्मि यछुदुःखभीमं ॥ मूलारा--ऊदा आकृष्टाः । बुद्धा मनाः । थाह अवस्थानं । कहिं पि कचिदपि सम्यक्स्त्रादीनामन्यतमेऽपि । तो पश्चात् । अदंति प्रविशन्ति। शसं झषा मत्स्थाः ॥ अर्थ-चार संज्ञारूपी नदीमें जब मुनि यते हैं तब वे कहांभी स्थिरताको प्राप्त होते नहीं अर्थात् संज्ञारूपी नदीमें बहते रहते थे मुनि अतिशय दुःखोंसे भयंकर संसारसमुद्र में प्रवेश करते हैं. आसागिरिदुग्गाणि य अदिगम्म तिदंडकखडसिलासु ॥ ऊलोडिदपम्भहा खुप्पंति अणंतियं कालं ॥ १३.४ ।।
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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