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________________ मूलाराधना आश्चा १२१९ PROMOTE निदान योऽल्पसौख्याय विधस्ते सौख्यनिस्पृहः ।। काकिण्या समार्ण दत्तं शंके कल्याणकारणम् ॥ १२६२।। घिजयोदया-जो अप्पसुक्खा हेतुं योऽल्पमुस्खनिमित्तं निदाने करोति परमे मुक्तिसुखे मनावरं कृत्वा । स काकण्या विक्रीपीते मणि बहुकोटितशतमौल्यम् ॥ संसारसुखाय निदानयंत निदति - मूलारा--स्पष्टम् ।। अर्थ-जो मनुष्य उत्कृष्ट मोक्षके सुखमें अनादर करके अल्प सुखके लिए निदान करता है वह अनेक NET कोटि रूपयोंकी कीमतवाला मणि कोही मिलने की इच्छासे बेचता है ऐसा समझ लेना चाहिए, ( सो भिंदा लोहत्थं णावं भिंदइ मणि च सुत्तत्थं ।। छारकदे गोसीरं डहदि णिदाणं खु जो कुणदि ।। १२२२ ॥ स सूत्राय मणि भिन्ते माय लोहाय भस्मने ।। कुधीदहति गोशीर्ष निदानं विदधाति यः॥ १२६३ ।। विजयोदया-सोभिद न भिनत्ति कीटोहार्थं ना अनेकयस्तुभृतां । भिनत्ति रत्नं च सत्रार्थ । गोशीप चंदनं दहति भस्मार्थ यो निदानं करोति स्वल्पार्थ । सारविनाशसाधयाभवमाच-सूपयानोपरि कथा यो निदानकारी, तेन नीप्रभृतिकं विनाशितं । अर्थास्यानकानि वान्यानि ॥ मूलारा-- गोसीरं बरचंदनं । अत्र स्मरविनाशनसाधादर्भो वेद्यः । अर्थ-जो मनुष्य निदान करता है वह मनुष्य लोहके कीलके लिए नौकाका भेदन करता है, दोरीके लिए रत्नहारको तोड़ता है, भस्मके लिए गोशीर्ष चंदनको जलाता है ऐसा समझना चाहिए. अर्थात् तुच्छ संसार सुखकी प्राप्तिके लिए निदान करना अयोग्य है. उत्कृष्ट संयमका उससे नाश होता है. रसोइयाकी कथामें उपयुक्त बातोंका उल्लेख है. 1 कोढी संतो लडूण डहाइ उच्छु रमायणं एसो ।। सो सामण्णं गासेह भोगहेदु णिदाणेण ।। १२२३ ॥
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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