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________________ मूलाराधना भृगारकथा करना इन चार वातास विरक्त रहना ये चार ब्रह्मवतकी भावनायें हैं. जिससे चल और उन्म 1 सता अर्थात् कामाविकार होगा ऐसे पदाथोंका त्याग करना चाहिये. ये ब्रह्मचर्य की पांच भावनायें हैं. आश्वासः १६ अपडिग्गहस्स मुणिणो सहफरिसरसयरूवर्गधेसु ॥ रागहोसादीणं परिहारो भावणा हुति ।। १२११ ॥ यतेः स्पर्श रसे गंधे वर्णे शब्दे शुभाशुभे॥ रागद्वेषपरित्यागो भावनाः पंच पंचमे ॥ १२५१ ।। विजयोन्या-अपरिग्महस्स मुापीणो परिप्रवरहितस्य मुनेः । सहफरिसरसयरूपगंधेसु शदस्पर्शरसरूपगंधेषु । मनोशेषु ! रागद्दोसावीण रागद्वेषयोः परिहारो विषयभेदातांचप्रकारभावना पंचभम्य ।। मनोज्ञेशरपद्रियार्थपरिहार्यभेदात्पचपरिमहजनभावनाः प्राहमूलाग-अपरिगाहस नर्मनन्यस्य । दोसादीणं आदिशब्देन मोहस्यामि प्रहणं ।। अर्थ-परिग्रहरहित मुनि मनोज्ञ और अमनाज्ञ एसे स्पर्श: रस, गंध, वर्ण और शब्द इनमें राग द्वेष HAI करते है. अर्थात स्पर्शादि पांच इष्टानिष्ट विपगोंमें रागद्वेष नहीं करना ये पांच परिग्रह त्यागत्रत की पांच भावनाये है. भावनामाहात्म्यं कथयति ण करेदि भावणाभाविदो खु पीडं वदाण सन्चोसि ।। साधू पालुत्तो समुहदो व किमिदाणि वेदतो ॥ १२१२ ॥ भावना भावयन्नेताः संयतो बलपीडनम् ।। विदधाति न सप्तोऽपि जागरूका कथं पुनः ।। १२५२ ।। विजयोदया- करेदि खन करोस्येव । का भाषणाभाविदो भाषनाभिर्भाषितः। पीई पीडायदाणं मतानां । सव्वासि सर्वेषां । साधू साधुः । पासुत्तो प्रकर्षण निवामुपगतः । समुहदोष समुद्धातं गतो था । किमिवाणि पेदितो। चेतयमानः॥
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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