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________________ लारापना आश्वास सटिति शरीरसंपल्यावर्तते प्रत्याख्यान वर्शपति साईं पडिलाहेदुं गदस्स सुरयस्स अगमहिसीए ॥ णटुं सदीर अंगं फोनि अहः मुहणा।। १.६१।। गतस्याहारदानार्थ सरतस्य तपस्विनः॥ क्षणान किं महादेव्या नष्टः कुष्ठेन विग्रहः ।। १०५३ ॥ पिंजरोदया-साधु पडिलाइटुं गदस्स साधोगहारवानार्थ गतम्य । सुरयस्य सुरतनामधेयस्य राज्ञः । आग. महिसीए अग्रमहिप्याः सदीए सत्याः शोभनाथाः । अंगं गई शरीरं नई । कोटेण कुछेन । जहा मुहत्तेण यथा मुहर्नेन ।। गरिति शरीरसंपद्यावतते इत्याख्यानकेन दर्शयति मुलाग-- साधु इति- साधु पडिलाभेदु संयमिनं भोजयितुं । गुरदस्स सुरतनाम्नी राज्ञः । अग्गमहिसीए पदमहादेयाः । मदीए सोमनायाः ।। अर्थ-सुरत राजाकी पानी बहुत ही सुदर थी. एक गमयम सजा मुनीश्वरको आहार देनेके लिये गया था उस समय इधर रानीका शरीर अंतर्मुहत में कोह रोगसे व्याप्त होगया. अभिप्राय यह है कि जो रानीका शर्रार अन्तमुहूर्त के वो बडा ही सुंदर और राजाको अत्यंत प्रिय था वही अन्तईहत के अनन्तर ही अत्यन्त विरूप हो गया. अतः शरीर परिवर्तनशील है यह बात इस उदाहरणसे स्पष्ट होती है. वझो य णिज्जमाणो जह पियई सुरं च खादि तंबोलं ॥ कालेग य णिज्जेता बिसए सेवंति तह मूढा ॥ १०६२ ॥ हंतुमने कृतो मूढो दुर्निवारण मृत्युना ॥ सेवते विषयं वध्यः पाणेनेष सुरादिकम् ।। १०९४ ॥ विजयोदया-बहो य जीयमाणो हन्तुं नीयमानः । जह पिया यथा सुगं पियति । खादितंयोलं तांबूलं भक्षयति । तथा कालेण य णिजंना मृत्युनानीयमाना मूढाः । घिसए सेति विषयाननुभवन्ति ॥ मुलारा-बज्यो इति-चौर्यापपराधेन बधाई: पुमान् । पयिन्नमाणो इंतु नीयमानः श्वपचेन । कालेण परिज्जतो मृत्युना नीयमानः ।
SR No.090289
Book TitleMularadhna
Original Sutra AuthorShivkoti Acharya
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages1890
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size48 MB
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