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________________ 101.13.15] [399 महाकइमुप्फयंतविरया महापुराण (13) पाविज्जइ इच्छिउ णयरु तेम्ब अम्हहं तूसइ परमेट्टि जेम्व। वाणारसिपुरवरि सच्चदिदि जिणवत्त घरिणि धणयत्तु सेट्ठि। अम्हई बेण्णि वि जण पुत्त तार्ह संसिक्खिय सत्थई 'तक्खराह। परदव्यहरणरय पावबुद्धि णउ सक्किउ गुरु विरयह णिसिद्धि। णिब्वेएं छड्डिवि सव्यसंगु अम्हारउ पिउ तवचरणि लग्गु। सिहिगिरिवरि सीलपसत्थएण सायरसेणहु सामथएण। आसण्णु वि सिग्घु' पराइएहिं जणु खज्जइ णउ वग्याइएहिं। तें वयणे अम्हहं जणिउ चोज्जु गय बंदिउ रिसि किउ' धम्मकज्जु । जगपुज्जें भयवंतें अवज्जु छंडाविउ तें महु मंसु मज्जु । गउ गुरु' पुरु भिक्खहि कहिं मि जाम सद्लें विणिहय बे वि ताम। सुरजाचारवें जित्तमयणु लइ एव्वहिं कीरइ ताहं वयणु। इय जाणिवि विरएप्पिणु विमाणु आरोहिउ सो तहिं सुहडभाणु। बहुदव्वें सहुँ "कुलणहमयंकु अकलंकु अवंकु विमुक्कसंकु। सुपइट्ठणयरिणियडइ सुठाणु गिरि धरणीभूसणु विउलसाणु । तहिं णिहिउ तेहिं जक्खामरेहि अहिमुहं जाइवि णायरणरेहि। 10 (13) हम इसे इच्छित नगर उसी प्रकार प्राप्त करा दें, जिससे हमारे गुरु सन्तुष्ट हों। वाराणसी नगरी में सत्यदृष्टि सेठ था। जिनदत्ता उसकी गृहिणी थी। हम दोनों उनके पुत्र थे। दोनों ने चौर्यविद्या के शास्त्र की शिक्षा ग्रहण की। दूसरों के धन का अपहरण करने में रत हम पापबुद्धि थे। पिता मना करने में समर्थ नहीं हो सके। निर्वेद के कारण सब परिग्रह छोड़कर हमारे पिता तपश्चरण में लग गये। शिखि पर्वत पर सागरसेन मुनि के शील से प्रशस्त सामर्थ्य से निकट रहने पर भी, लोगों को आये हुए व्याघ्रादि वन्यपशु नहीं खाते थे। इस वचन से हमें आश्चर्य हुआ। हम वन्दना करने गये। ऋषि ने धर्मकार्य किया। विश्वपूज्य ज्ञानवान उन्होंने निन्दनीय कर्म, मधु, मांस और मद्य छुड़वा दिया। जब गुरु सुप्रतिष्ठ नगर में भिक्षा के लिए गये, तब एक सिंह ने हम दोनों को मार डाला। हम लोग देवरूप में उत्पन्न हुए। सो इस समय हमें उनका काम को जीतनेवाला वचन करना चाहिए। यह जानकर और विमान बनाकर, उन लोगों ने उस सुभटसूर्य को उस पर बैठाया और प्रचुर धन के साथ कुलरूपी आकाश के उस अकलंक, अबक्र और विमुक्त-शंक चन्द्र (चन्द्र कलंकवाला और टेढ़ा होता है) को सुप्रतिष्ठ नगर के निकट जहाँ अच्छे स्थान तथा विपुल शिखरोंवाला धरणीभूषण पर्वत था, वहाँ यक्ष देवों ने उसे रख दिया। तब नागर जन राजा और सादर स्वजन सामने जाकर बजते (13). ' तकराई। 2. AP ठंडेवि। . AP सुद्ध। 4. AP क्रय धम्म । 5. A पुरवस; ? पुरु गुरु। 6. AP णियकुलपयंक।
SR No.090277
Book TitleMahapurana Part 5
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorP L Vaidya
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages433
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size10 MB
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