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________________ महाकवि पुष्पवन्त विरचित 73 घसा - किंकरु" हयगलहु पालियछलहु को कहि विणमाइ ॥ कूरगड अवरु खयरु उठाइ ||१९|| नाणीलरहु २० दुबई - पण चावपाणि रे खिहिखहि जं पई दुकायं कटं ॥ दं हयगीव देवपयपंकयदोहफलं समागयं || हो कि बोलमि मौरम चल्लमि । एंव चवेष्पिणु विहुणु । -१२.२०१८ ] आउछु दाइ किंकर किंकरि खरखुरम्यधरि यादणि चप्पिणि लग्गइ थामेँ वग्गइ पइस दूसइ हिंसइ तास दुइ हाइ रिव पचारइ खलइ निवारइ करिकरच 'डिि दंताद विहि रकिलिविडहिं | धाव पाव | कुंजरि कुंजरि । हरिवरि हरिवरि । संदणि संदणि । रंगइ णिग्गइ | भंडषु मग्गइ । जै रूस | दीसइ णास | फोकर थकइ । चूर जूरइ । दाइ मारइ | लालपिंडिहि । कताकतिहि । २३१ ܐ १५ धत्ता-तब छलका कपट करनेवाले अश्वग्रोवका ( एक और ) अनुचर क्रोधसे कहीं नहीं जा सका । नामसे नीलरथ वह मानो क्रूर ग्रह हो, एक और विद्याधर दौड़ा ||१९|| २० हाथ में धनुष लिये हुए वह कहता है- "है अवलन जटी, सुने जो पाप किया है, अश्वग्रोव देवके चरणकमलों द्रोहका वह फल तेरे पास आ गया है। अरे में बोलता क्या हूँ, मैं मारता हूँ, फेंकता हूँ" यह कहकर अपने बाहु ठोंककर वह आयुध दिखाता है, दौड़ता है, उछलता है। अनुचर अनुचरपर, गज गजपर, तीव्र खुरोंसे क्षय धारण करनेवाले अश्ववर अश्ववरपर नेत्रोंके लिए आनन्ददायक स्यन्दन स्यन्दनपर । चाँप कर लगता है, चलता है, निकलता है, स्थैर्य से क्रुद्ध होता है, युद्ध मांगता है, प्रवेश करता है, दूषित करता है, गरजता है, रूठता है, हिंसा करता है, त्रस्त करता है, दिखाई देता है, छिप जाता है, कठिन काम करता है, हकारता है, पुकारता है, ठहरता है, शत्रुको ललकारता है, चूर-चूर करता है, पीड़ित करता है, स्खलित करता है निवारण करता है, विदीर्ण करता है, भारता है, हाथोकी सूँड़के समान प्रचण्ड, गजमुखोंके अग्रिमकाष्ठों, दांतों, १३. A किकर । २०. १. AP बुकियं । २. AP भारिवि । ३ A भंजइ । ४. A गायभुवड | ५. A किलिवदिहि | ६. AP add after this : दंडाडिहि ।
SR No.090275
Book TitleMahapurana Part 3
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorP L Vaidya
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2001
Total Pages522
LanguageHindi, Apbhramsa
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size15 MB
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