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________________ ६४ मदनजुद्ध काव्य प्रकारके अपशकुन होने पर उनका परिहार करना आवश्यक है । यद्यपि कार्य सामग्रीमे होना है । एक ही कारण नहीं होता— “कार्यस्यजनिका सामग्रीचैकंकारणं ।' किन्तु फिर भी शुभ सामग्रीमे शुभ शकुन भी सम्मिलित हैं । सामर्थ्यका अप्रतिबन्ध तथा कारणान्तरका अवैकल्प यह उभयरूप मामग्री है । किन्तु मोहने गर्वक कारण किसी भी प्रकारके अपशकुनका विचार नहीं किया और आगे बढ़ने लगा । प्रथम मलि चल्ननय फोही फुक्करइ 'नाइक वाझा पालउ वनिय अणुसर वांवई कालउ विसहरू भुइ सिउँ फणु हण सुक्क विरख चडि जुििण बोलइ दाहिणइ ।।११।। अर्ध-जब गजा मोह भट (सेना-सहित) आगे बढ़ा तो उसने पहली मंजिन्नमे देखा कि.. फौही (अंगाली) फुस्कार कर रही है । मालाके द्वारा { बाझुइ) बन्धा हुआ नायक चल रहा है. उस्गेम बँधी हुई स्त्री भी खिसक रहीं है । बॉबीक कपर काना विषधर नगग माता हुआ अपने फणको पटक रहा है । सृग्ने वृक्ष पर चढ़कर दाहिनी तरफ जुगिनी (चिल्ली) बोल रही व्याख्या-माधारास्थिति में श्रुणाली सदैव मधुर शब्द बोलती है लकिन जब किसी व्यक्तिकी भाग्यदशा उत्तम नहीं रहती तब वह उसके मम्मुख विकत शब्दोम बोलती है । काकी स्वरकी भी यही स्थिति होती है । जाने हार नायक पुरुषका पालाम बंधा होना एवं उसके पीछे स्वीका खिचा चला जाना भी कार्य की हानि का सूचक है । काले सर्पका फन पटका, बिल्ला आदि का मुख वृक्ष पर चढ़कर दाहिने ओर बोलना भी पराजयकी सूचना देते हैं । इसका अभिप्राय है कि सूखे वृक्षके समान सभी कार्य फल सहन हो जाएंगे । मंगलमय यात्रा करने वाले इस प्रकारके अपशकन देखकर कुछ समयके लिए यात्रा स्थगित कर देते हैं और विघ्न नितारणके उपाय करते हैं किन्तु मोहने अपनी प्रथम यात्रामें ही कुछ सोचविधार नहीं किया और आगे बढ़ता गया ।। सवण सुपमा नहु पानइ चड़ियव गठिये अति कज्ज विनासण अवसरि पुरिमहं गइय मति मजलि भजलि करि चल्लिउ धम्मप्पुर घरहि सार जणाई आगम ध्यातम बिहु चरहिं ।। ९२।। फरही 'फर कई २. नायक चानह नान गुबती अपायरइ
SR No.090267
Book TitleMadanjuddh Kavya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuchraj Mahakavi, Vidyavati Jain
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages176
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size3 MB
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