SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 8
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ I प्रथम परिच्छेद [ ७ व्यवहार कदापि नहीं करना चाहिए ।" साथ ही वह इस बात से भी परिचित है कि- " यद्यपि राजा समस्त देवों का प्रतिनिधि है फिर भी उसमें और देवमें एक अन्तर है। और वह यह है कि राजा के पाससे अच्छा-बुरा परिणाम तत्काल ही मिल जाता है, जब कि देवके पाससे वह जन्मान्तर में प्राप्त होता है ।" फिर स्वामित्, क्या जिनराजकी आपको बिलकुल स्मृति नहीं है ? राजन्, बहुत वर्ष पहले यह जिनराज हमारे इसी भव-नगर में रहता और दुर्गति- वेश्या के यहाँ पड़ा रहता था। चोरी करनेकी रोजकी प्रादत थी । फलतः यह कोतवाल के द्वारा पकड़ा जाता, पीटा जाता और यहाँ तक कि दी जाती । एक दिन काललब्धि से यह दुर्गति वेश्यासे विरक्त होकर अपने श्रुत मन्दिर में घुसा । वहाँ इसे त्रिभुवनके सारभूत अमूल्य तीन रत्न हाथ लगे। इन रत्नों ने इसे इतना आकर्षित किया कि इनके आकर्षणसे यह घर, स्त्री, बाल-बच्चे - सबको भूल गया और तुरन्त उपशम-श्रश्व पर सवार होकर चारित्र-पुर चला गया । विषय और इन्द्रिय योधाओंने इसे वश भर रोका, परन्तु वे रोकने में समर्थ न हो सके । देव, इतना ही नहीं, जब चारित्र-पुरके पाँच महाव्रतभटों ने देखा कि जिनराज अमूल्य रत्नत्रयीका स्वामी है और यह राज्य संचालनके सुयोग्य है तो उसे तपोराज्य दे दिया । स्वामिन् इस प्रकार यह जिनराज गुणस्थानरूपी सीढ़ियोंसे सुशोभित और दुर्ग-जैसे दुर्गम चारित्र-पुर में सुखपूर्वक राज्य कर रहा है । महाराज, इसके सम्बन्धका एक नया समाचार और सुना है कि अचिर भविष्य में जिनराजका मोक्षपुर में विवाह होगा। इसलिए समस्त जनपदों में उत्सव समारोह मनाया जा रहा है।
SR No.090266
Book TitleMadan Parajay
Original Sutra AuthorNagdev
AuthorLalbahaddur Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages195
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size3 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy