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प्रथम परिच्छेद
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व्यवहार कदापि नहीं करना चाहिए ।" साथ ही वह इस बात से भी परिचित है कि- " यद्यपि राजा समस्त देवों का प्रतिनिधि है फिर भी उसमें और देवमें एक अन्तर है। और वह यह है कि राजा के पाससे अच्छा-बुरा परिणाम तत्काल ही मिल जाता है, जब कि देवके पाससे वह जन्मान्तर में प्राप्त होता है ।" फिर स्वामित्, क्या जिनराजकी आपको बिलकुल स्मृति नहीं है ?
राजन्, बहुत वर्ष पहले यह जिनराज हमारे इसी भव-नगर में रहता और दुर्गति- वेश्या के यहाँ पड़ा रहता था। चोरी करनेकी रोजकी प्रादत थी । फलतः यह कोतवाल के द्वारा पकड़ा जाता, पीटा जाता और यहाँ तक कि दी
जाती ।
एक दिन काललब्धि से यह दुर्गति वेश्यासे विरक्त होकर अपने श्रुत मन्दिर में घुसा । वहाँ इसे त्रिभुवनके सारभूत अमूल्य तीन रत्न हाथ लगे। इन रत्नों ने इसे इतना आकर्षित किया कि इनके आकर्षणसे यह घर, स्त्री, बाल-बच्चे - सबको भूल गया और तुरन्त उपशम-श्रश्व पर सवार होकर चारित्र-पुर चला गया । विषय और इन्द्रिय योधाओंने इसे वश भर रोका, परन्तु वे रोकने में समर्थ न हो सके । देव, इतना ही नहीं, जब चारित्र-पुरके पाँच महाव्रतभटों ने देखा कि जिनराज अमूल्य रत्नत्रयीका स्वामी है और यह राज्य संचालनके सुयोग्य है तो उसे तपोराज्य दे दिया । स्वामिन् इस प्रकार यह जिनराज गुणस्थानरूपी सीढ़ियोंसे सुशोभित और दुर्ग-जैसे दुर्गम चारित्र-पुर में सुखपूर्वक राज्य कर रहा है ।
महाराज, इसके सम्बन्धका एक नया समाचार और सुना है कि अचिर भविष्य में जिनराजका मोक्षपुर में विवाह होगा। इसलिए समस्त जनपदों में उत्सव समारोह मनाया जा रहा है।