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________________ १८ ] मदनपराजय इन्द्रका वचन सुनकर दयपान कर दिगः । वह मोक्षगुरुगे अधिपति सिद्धसेनके सामने पहुँच गयी। सिद्धसेनने सामने आते ही उससे पूछा-तुम कौन हो? दयाने कहा-मैं दया हूँ। सिखसेन-तुम यहाँ किसलिए पायी हो ? दया-मुझे यहाँ इन्द्रने भेजा है। सिडसेन-इन्द्रने तुम्हें यहाँ किस कार्यसे भेजा है ? दयाने उत्तरमें इन्द्रके द्वारा कहा हुमा समस्त वृत्तान्त सिद्धसेनको सुना दिया। तदनन्तर सिद्धसेन कहने लगे-यह प्रस्तावित वर कौन-सा वीर है ? क्या मेरी कन्या-जैसी योग्यता उसमें है ? उसका गोत्र, कुल और रूप कैसा है ? उसके शरीरकी ऊंचाई कितनी है ? सिद्धसेनकी प्रश्नावली सुनकर दया कहने लगी-प्रभो, आप वरके रूप, नाम, गोत्रके सम्बन्धमें क्यों पूछ रहे हैं ? दयाके प्रश्नके उत्तरमें सिद्धसेन कहने लगे-दया, सुनो, मैं तुम्हें इस सम्पूर्ण प्रश्नावलीके पूछने हेतु बतलाता हूँ। वह कहने लगे दया, जो वर रूपवान्, कुलीन, देव-शास्त्र और गुरुओंमें भक्तिमान्, प्रकृतिसे सज्जन, शुभलक्षण-सम्पन्न, सुशील, धनी, गुणो, सौम्य-मूर्ति और उद्यमी होता है उसीको कन्या देनी चाहिए। यदि किसी वरमें ये विशेषताएं न हों तो उसे कन्यादानका पात्र नहीं समझना चाहिए। सिद्धसेन कहने लगे - दया, मैंने इसी कारण से यह वर-प्रश्नावली तुमसे पूछी है। सिद्धसेनकी बात सुनकर दया कहने लगी-सिद्धसेन, तब आप अपनी प्रश्नावलीका उत्तर सुन लीजिए ---
SR No.090266
Book TitleMadan Parajay
Original Sutra AuthorNagdev
AuthorLalbahaddur Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages195
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size3 MB
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