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________________ चतुर्थ परिच्छेद [ १४७ केवलज्ञानको बात सुनकर मोहको भी रोष हो पाया । उसने पाशा-अनुषसे गारवनामक तीन बाण लेकर केवलज्ञानके ऊपर छोड़े। परन्तु केवलज्ञानवीरने उन्हें रत्नत्रयबाणसे बीच में ही छिन्न-भिन्न कर दिया और पुन: समाधिस्थानमें बैठकर उपशम बाण चलाया जो मोहके वक्षस्थलमें विंध गया और मोह मूच्छित होकर पृथ्वीपर मा गिरा। मोहको थोड़ी ही देर में चैतन्य हो पाया और इस बार उसने केबलशानीरके ऊपर प्रमादरूप बाणावलीको वर्षा प्रारम्भ कर दी। किन्तु केवलज्ञानबीरने मावश्यक और त्रयोदश चारित्रबारणोंसे उसे बोच ही में भंग कर दिया। और मोहसे यह कहकर कि 'अरे मोह, अपना धनुष, संभालो' उसने निर्ममत्व बाणसे मोह वीरके हाथ में स्थित धनुषको छेद डाला। तदुपरान्त मोहने केवलज्ञान वोरफे ऊपर मदान्ध गज-घटाएँ भेजीं, जिन्हें केवलज्ञानवीरने अपने. हाथियोंकी घटाओंसे रोक दिया और पीछेसे उपशमके भाघातसे उनका विध्वंस कर दिया। जब मोहने देखा कि उसका अब तकका प्रयत्न बिलकुल निष्फल गया है तो प्रबकी बार उसने कर्मप्रकृति-समूहका प्रयोग केवलज्ञानवीरके ऊपर किया। उसके प्रयोग करते ही इस प्रकारकी स्थिति उत्पन्न हो गयी प्रकृति-निच्यसे डरकर पर्वत चलित होने लगे। देव, नर और साँप कम्पित होकर आवाज करने लगे। वसुधा कप गयो और समुद्र व्याकुल हो उठे । इस प्रकार सम्पूर्ण प्रकृति क्षुब्ध हो उठी। इस तरह प्रकृति-समूह को महादुर्जय देखकर जिनराजको सेनामें भयका संचार होने लगा और कंपने लगी। जब केवलज्ञान वीरने अपने सैन्यकी यह स्थिति देखी तो उसने सामायिक, छेदोप
SR No.090266
Book TitleMadan Parajay
Original Sutra AuthorNagdev
AuthorLalbahaddur Shastri
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages195
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size3 MB
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