SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 487
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १५० क्षपणासार [गापा २१४ इन गाथाओं में पुरुषवेदसहित मानके उदय के साथ क्षरकणि चढ़ने वाले की प्ररुपणा है । जबतक अन्तर नहीं किया गया यानि अन्तर करनेसे पूर्वतक क्रोध या मान सहित क्षपकश्रेणिपर आरोहण करनेवाले जीवकी क्रियाओंमें कोई अन्तर नहीं है, अन्तर करने के पश्चात् विभिन्मता है और वह विभिन्नता यह है कि अन्तरके पश्चात् क्रोधको प्रथमस्थिति नहीं होती। जिसप्रकार पुरुषवेदसहित क्रोधोदयके साथ क्षपकके अन्तमुहर्त प्रमाण क्रोधकी प्रथमस्थिति होतो थी उसीप्रकार पुरुषवेदोदयसहित मानोदयवाले क्षपकके मानकी प्रथम स्थिति होती है । क्रोधोदयसे श्रेणि चढ़ने वाले क्षपकके कृष्टिकरणकालपर्यन्त क्रोधको प्रथमस्थिति और क्रोधको तीनों संग्रहकृष्टिका क्षपणाकाल, इन दोनोंको मिलानेसे कालका जो प्रमाण होता है उतनाकाल मानोदयसे श्रेणिपर आरोहण करनेवाले के मान को प्रथमस्थिति का है। क्रोधोदयो कड़े हुए पशाने हाल में अरवारीकरण व अपूर्वस्पर्धक करता है उसकालमें मानोदयसे श्रेणो चढ़ा हुआ क्षपक क्रोधका स्पर्धकरूपसे क्षय करता है, क्योंकि मानोदयसे श्रेणी चढ़ क्षपकके क्रोषोदयका अभाव होनेसे स्पर्धक. रूपसे विनाश होने में कोई विरोध नहीं है । अनिवृत्तिकरणपरिणामोंका अभिन्नस्वभाव होते हुए भी भिन्न कषायोदयरूप सहकारिकारणके सन्निधान के चशसे प्रकृतमें नानापना सिद्ध है अर्थात एककाल में कार्योकी विभिन्नता हो जाती है। क्रोधोदयसे युक्त क्षपक जिसकालमें चार संज्वलनकषायोंकी कृष्टियां करता है उसकालमें मानोदयसहित क्षपक उससमय तोन संज्वलन कषायोंका अश्वकर्णकरण करता है। क्रोधोदयी क्षपक जिसकालमें क्रोधको तीनसंग्रहकृष्टियों का क्षय करता है उसकालमें मानोदयी क्षपक संज्वलनमान-माया-लोभकी (३४३) ६ सग्रहकृष्टियां करता है । क्रोधोदयवाला क्षपक जिसकालमें मानकी तीनसंग्रहकष्टियोंका क्षय करता है उसोकाल में मामोदयीक्षपक भी मानकी तीनसंग्रहकष्टियोंका क्षय करता है इसमें कोई अन्तर नहीं है। इस स्थलसे लेकर मागे जिस प्रकार क्रोधके उदयसे श्रेणि चढ़ने वाले की क्षपणाविधी कही गई है वैसी ही विधि मानोदयसे श्रेणी चढ़नेवाले जीयको जानना चाहिए । आगे पुरुषवेदसहित मायो. दयसे श्रेणि चढ़नेवाले क्षपकको विभिन्नता बतलाते हैं-- ____ अन्तर करके मायाकी प्रथमस्थिति करता है, क्योंकि क्रोध मानकषाय के उदयका अभाव है । क्रोधको प्रथमस्थिति, अश्वकर्णकरणकाल, कृष्टिकरणकाल, क्रोधकी तीनसंग्रहकृष्टियोंका क्षपणाकाल, मानकी तीनों संग्रहकृष्टियोंका क्षपणाकाल, इनसर्व कालोंको मिलाने से कालका जो प्रमाण हो उतनाकाल मायोदयीक्षपकको प्रथमस्थितिका
SR No.090261
Book TitleLabdhisar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Shastri
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages644
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, Philosophy, & Religion
File Size16 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy