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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org देववन्दना प्रयोगानुपूर्वी हे भगवन् ! सामायिक ( देववन्दना ) करूँगा, सम्पूर्ण सावद्य योग- पाप कर्मों का त्याग करता हूँ। जब तक जीऊँ ( नियम है) तब तक तीन प्रकार मन से वचन से और काय से सावद्य योग न करूँगा, राऊँगा और न करते हुए को अच्छा मानूँगा । अर्हन्त आदिक क्रिया कर्म सम्बन्धी अतीचारों का त्याग करता हूँ । आत्मसाक्षिपूर्वक निन्दा करता हूँ तथा गुरु आदि की साक्षिपूर्वक गर्दा करता हूँ । इतना ही नहीं किन्तु जब तक भगवान् अर्हन्त देवों का पर्युपासन करूँगा तब तक जिनसे पाप कर्मों का उपार्जन होता है ऐसे दुराचारों का भी त्याग करता हूं । इस प्रकार उक्त सामायिक दण्डक पढ़कर पुनः तीन' आवर्त और एक शिरोनति करें । पश्चात् जिनमुद्रा जोड़कर कायोत्सर्ग करें । जिसमें " णमो अरहंताणं" इत्यादि मंत्र का सत्ताईस उच्छासों में नौ बार पूर्वोक्त विधि के अनुसार जाप देवें या चिंतवन करें । अनन्तर भूमिस्पर्शनात्मक पंचांग नमस्कार करें पश्चात् पूर्वोक्त विधि से खड़े होकर तीन आवर्त और एक शिरोनति कर नीचे लिखा ' चतुर्विंशतिस्तव” पढ़ें । तद्यथा; - Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir चतुर्विंशतिस्तव थोस्सामि हं जिणवरे तित्थयरे कवली अणंतजिणे । णरपवरलोय महिए विहुयरयमले महपणे ॥१॥ लोयस्सुज्जोययरे धम्मं तित्थंकरे जिणे वंदे | अरहंते कित्तिस्से चउवीसं चेव केवलिणो ॥२॥ उसहमजियं च वंदे संभवमभिणंदणं च सुमई च । पउमपहं सुपासं जिणं च चंदप्पहं वन्दे || ३ || १ - कृत्वावर्तत्रयशिरोनती भूयस्तनुं त्यजेत् ॥ ५ ॥ २ - प्रोच्य प्राग्वत्ततः साम्यस्वामिनां स्तोत्रदण्डकम् । For Private And Personal Use Only १७
SR No.090257
Book TitleKriya Kalap
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Shastri
PublisherPannalal Shastri
Publication Year1993
Total Pages358
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, Religion, & Ritual
File Size15 MB
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