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कविवर ठक्कुरसी
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पार्श्वनाथ जयमाला
दाकण नयणारुणु नमविहरे, जिह गय घड भय भग। तह जिण गुण मरिण सुमरंतियहि, थिरूण पाहि उपसंगह। महा दिङ्ग दंत सपाणि पयंडू, चहू दिसि घालीय सूडा उंडु । नलग्गइ हथिगरु ता जासु, परंतह वित्ति चिता । पातु ॥१॥
रावणु देहु सु सह. करालु, दुरा रुण गेत जिसहि विझालु । सुस्याल समौ हरि होइन कासु, परंतह बित्ति चिप्तामणि पासु ।।२।। असु ठियज्माल समीर सहाय, चहू दिसि लग्ग न भगत बाय । न दुवकह नीडा सो जिहु वासु, धरंतह चित्ति चितामणि पासु ।।३॥ करेण छियो जसु जाइन अंगु, भरि विसि लच्छरि किण्ह मुगु । न लग्गा चूरि उसो जिदु रासु, परंतह चिसि चितामणि पासु ।।५।। तरंग सुमुठिय नीरि प्रमाह, भरिउ जल जति न लभह पाह ।। सुहोइ समूदु जिसउ थल वासु, घरंतह चित्ति चितामणि पासु ॥५॥ जिसण्णिय लेस मसिय सिरवाहि, भगंदर सूल जलोदर बाहि । तिरणासहि कोढ पमूह खय स्वास. घरंतह चित्ति चिंतामणि पासू ।।६।। कुसौण जिकु ग्रह कूर कुशेष, कुमित्त कुसज्जन कुप्रभ सेव । करति न ते भय दुख पमासु, धरंतह चित्ति पितामणि पासु ॥७॥ कही चिरू कम्मि किये अरि घधि, भरिउ तनु संकलि धल्लि निरपि । तहत गयो प्ररि करिवि निरासु. थरंतह चिसि चिंतामणि पासु ॥८॥ महा ठग घोर जि हाएणि दुद्र, दिनाइय कम्मरण मत मसुठ । नलगहि लील गमे दिन पासु, परंतह चित्ति बितामणि पासु ॥ लिया सुव बंधव सज्जन इट्ट, उपज्जीह चित्त, रम जिह दिट्ट ! मणं छिय सम्बइ पूरहि पासु, घरंतह चित्ति चित्तामणि पासु ॥१०॥
घत्ता इय घर बइमाला पास जिण गुण विसाला । पहहि जि णर परी, तिण्णि संझा विचारि । कहहि करि प्रनंदो, ठकुरसी पेल्ह नंदो। लहहि ति सुखसारं, वछियं बहु पयारं ॥११॥
॥ इति पाश्वनाथ जयमाला समाप्तः ।।