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________________ बावनी १४५ पापिष्ट नीच जन सुती, करम सदा ऋमि मल मुगति । छोहल्ल ताहि पूजह जगत, करम तरखी विपरीत गति ।।१८|| महनिस मज्छ मल्छ, कमछ जस मजिम रहे नित। मौन सहित बफ धन, रहे लवलीन इक्क चित । कदर गुफा निवास, भसम मानहो चढावइ । पवन महारी सर्प, मंग माबरी मुडावह । इनि मांहि कहउ किण पद लह्यो, कहा जोग साँचै जुगति । छोहल कहे निष्फल सबै, भाव बिना न हुबै मुगति ।।१६।। कबहू सिर परि छत्र, चयि सुरुषासन धावइ । कबहू केलो भ्रम, पाइ पाणही न पावइ । कबहिं पठारह भष्ष, कर भोजन मन बचित । कहि न षलु संपजइ, पुधा पीडित कलप षिस । लभ न कबहू तृण सध्यारो, कहि रमइ तिय भाव रसि । बहु भाइ छंद छीहल कहर, नर चित नस्पद देव बसी ॥२०॥ खतिय रणि मज्जनो, विप्प माचार विहीणौ । तपीये जीति का अंगि, रहै चित लालच क्षीणो। तीय जु मति निलंज्ज, लज्ज तजि घरि घरि डोला । सभा मांहि मुषि देखि, साषि जउ कूड़ी बोलइ । सबक स्वामी द्रोह करि, संग रहइ न इक षिण । छीहल कहइ सो परिहरि, नृपति होइ बिवेक बिण ।।२१।। गरब न कर गुणहीन, प्ररे कंचन के गिरवर । तो समीपि पाषाण, पथ्थि सरुवर ते तरुवर । किये न अप्प पमान, वृषा गुरुवत्तए तेरउ । मलयाचस सलहिज, सुजस तस संगति केरउ । कटु तिक्त कुटिल परिमल रहित, तरू अनंत चे बन भया । श्री पंड संगि छीहल कहइ, ते समस्त चंदन भया ।।२२।। घरी घरी नप द्वार, एह घडियाल बज्ज । कहै पुकारि पुकारि, माउ षिणही लिए छौज्ज । १. गहि
SR No.090252
Book TitleKavivar Boochraj Evam Unke Samklin Kavi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKasturchand Kasliwal
PublisherMahavir Granth Academy Jaipur
Publication Year
Total Pages315
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Biography, & History
File Size5 MB
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