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________________ 米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米求法 *** ** [******米津米米米米米米米米米米米米米米米米米******深 कषायजय-भावना किसीसमय नारद अपने गुरुभाई से मिलने के लिए आया हुआ है था। उससमय पर्वत अपने शिष्यों को कर्मकाण्ड विषयक पाठ पढ़ा रहा था। *उसने अज्जैर्यष्टव्यमिति इस पाठ का बकरे की बली देकर होम करना | नाहिये ऐसा अर्थ किया। भारत ने समझाया कि इस अति का यह अर्थ | उचित नहीं है। गुरुजी ने इस श्रुति का तीन वर्ष पुराने धान से , जिसमें कि उगने की शक्ति नहीं हो, उससे हवन करना चाहिये ऐसा अर्थ बताया था। धर्म अहिंसा लक्षण वाला होता है। हिंसात्मक क्रिया धर्म का रूप धारण नहीं कर सकती। नारद के द्वारा युक्तिपूर्वक समझाये जाने पर भी | पर्वत अपने दुराग्रह पर अड़ा रहा। दोनों में वादविवाद होने लगा। दोनों ने * अपना मध्यस्थ राजा वसु को चुना। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि जिसका कहना । झूठ होगा, उसकी जबान काट दी जाय। पर्वत ने घर जाकर सारा किस्सा अपनी माता को सुनाया। माता ने उसे बहुत फटकारा किन्तु जब उसे प्रतिज्ञा की बात मालूम पड़ी तो वह * घबरा गयी। वह पुत्र के प्रेम में पागल होकर राजा वसु के पास गयी। उसने * वसु से कहा कि "हे पुत्र ! तुम्हें याद होगा कि मेरा एक वर तुमसे लेना बाकी रहा है। कल तुम्हारे दरबार में पर्वत और नारद आयेंगे। यद्यपि नारद का पक्ष सही है तो भी तुमको पर्वत के पक्ष में समर्थन करना है।" राजा वसु * ने वैसा ही करने की हामी भर दी। । दूसरे दिन राजसभा लगी हुई थी। पर्वत एवं नारद ने राजसभा में *प्रवेश करके अपने आने का कारण बताया तथा अपना-अपना पक्ष प्रस्तुत | किया तथा अपने प्रतिज्ञावाक्य राजा को अवगत कराये। राजा यद्यपि सत्य | * को जानता था तथापि उसने पर्वत के पक्ष में अपना समर्थन किया। उसके * झूठ बोलते ही सिंहासन जमीन में धंसने लगा। नारद के अनेकों बार * Bal समझाने पर भी उसने अपना आग्रह नहीं छोड़ा। पापकर्म के उदय से उसका * सिंहासन पृथ्वी में समा गया और राजा वसु मरकर सातवें नरक में गया। तात्पर्य यह है कि माया के कारण असत्य बोलने वाले राजा वसु की यह दुर्दशा हुई । अतः आत्मकल्याण करने के इच्छुक भव्य जीव को माया कषाय का अवश्य ही परिहार करना चाहिये। 深米米米米米米米米迷米米米米米米米染米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米米 ※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※※
SR No.090250
Book TitleKashayjay Bhavna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakkirti Maharaj
PublisherAnekant Shrut Prakashini Sanstha
Publication Year2001
Total Pages47
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size1 MB
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