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________________ मार्गदर्शक :- आचाव द र्श मोह के उपशमन कार्य को प्रारंभ करने वाला उपशामक पर यदि पशु देवादि कृत चार प्रकार के उपमर्ग एक साथ हो जावें, तो भी निश्चय से दर्शन मोह के उपशामना में प्रति बंध होने पर उस कार्य को वे क्षति नहीं प्राप्त करा सकते । इस कथन से यह बात भी प्रतिपादित की गई है कि दर्शनमोहोपशामक के उस अवस्था में मरण का प्रभाव भी सूचित किया गया हैं- "दसणमोहोवसामणं पारंभिय उवसाममाणस्स जइ वि च उबिहोवसग्गवम्गो जुगमुचट्ठाइ तो वि णिच्छरण दसणमोहोवसामणमेतो पडिबंधे ण विणासमाणेदि ति वुत्तं होइ । एदेण दसणमोहोवसामगस्स तदवत्थाए मरणाभावो वि पदुष्पाइदा दव्यो।" "णिरासाण' के कहने से सूचित होता है कि दर्शनमोहोपशामक उस अवस्था में सासादन गुणस्थान को नहीं प्राप्त होता है । दर्शन मोह की उपशामना होने के अनंतर यदि उपशम सम्यक्त्व का जघन्य से एक समय तथा उत्कृष्ट से छह प्रावलीकाल शेष बचा है तो वह सासादन गुणस्थान को प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं प्राप्त होता । इससे सासादन गुणस्थान को प्राप्त होना भजनीय है। दर्शन मोह के क्षय होने पर सासादन गुणस्थान में प्रतिपात नहीं होता; कारण क्षायिक सम्यक्त्व के प्रतिपात का अभाव है । सागारे पट्टवगो णिवगो मज्झिमो य भजिययो । जांगे अण्णदरम्हि य जहएणगो तेउलेस्ताए । साकार उपयोग में विद्यमान जीव ही दर्शन मोह के उपशमन का प्रस्थापक होता है, किन्तु उसका निछापक तथा मध्यम अवस्था वाला जीव भजनीय है। ___ मन, वचन तथा काय रूप योगों में से एक योग में विद्यमान तथा तेजोलेश्या के जघन्य अंश को प्राप्त जीव दर्शन मोह का उपशमन करता है।
SR No.090249
Book TitleKashaypahud Sutra
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorSumeruchand Diwakar Shastri
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages327
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size7 MB
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