SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 163
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ -- - विशेषाधिक है। नरक गति में मानका जत्रन्यकाल नरकंगति के मार्गदर्शक :- अजधय मायालागसीसहयातगणा है। देवगति में माया का जयच्यकाल नरकगति के जधन्य मानकाल से विशेषाधिक है। * मनुष्य तथा तिर्यंचगति में मान का जघन्यकाल देवगति के जघन्य मायाकाल से संख्यातगुणा है। मनुष्य और तिर्यंचों के क्रोधका जघन्य काल उनके जघन्य मान काल से विशेषाधिक है। मनुष्य और तिर्यंचों के माया का जघन्यकाल उन्हीं के जघन्य क्रोध काल से विशेष अधिक है। उनके लोभ का जघन्यकाल उन्हीं मनुष्य तथा तिर्यंचगति के जघन्य माया काल से विशेषाधिक है। नरकगति के क्रोध का जघन्यकाल मनुष्य तथा तिर्यंचयोनि के जीवों के जघन्य लोभ-काल से संख्यातगुणा है। देवगति में लोभ का जघन्य काल नरकगति के जवन्य क्रोध काल से विशेष अधिक है। ____ नरकगति में लोभ का उत्कष्टकाल देवगति के जघन्य लोभ काल से संख्यातगुणित है। देवगति में कोध का उत्कटकाल नरकगति के उत्कृष्ट लोभकालसे विशेष अधिक है। देवगति में मानका उत्कृष्ट काल देवगति के उत्कृष्टक्रोधकाल से संख्यातगुणा है । नरकगति में मायाका उत्कृष्टकाल देवगति के उत्कृष्ट मानकाल से विशेष अधिक है । नरकगति में मानका उत्कृष्ट काल नरक गति के उत्कृष्ट माया काल से संख्यातगुणा है । देवगति में मायाका उत्कृष्ट काल नरकगति के उत्कृष्ट मान काल से विशेषाधिक है। ___ मनुष्य और तिर्यंचों के मार . उत्कृष्ट काल देवगति के उत्कृष्ट माया काल से संख्यातगुणा है। मनुष्य और तिर्यंचों के कोष का उत्कृष्टकाल उन्हीं के उत्कृष्ट मानकालसे विशेषाधिक है। मनुष्य
SR No.090249
Book TitleKashaypahud Sutra
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorSumeruchand Diwakar Shastri
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages327
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size7 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy