SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 127
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( ५० } बावीस परारसगे सत्तग एगारसुरावीसाए । तेवीस संकमो पुरा पंचसु पंचिदिए हवे ॥३१॥ तेईस प्रकृतिक स्थान का संक्रम बाईस, पंद्रह सत्रह, ग्यारह तथा उन्नीस प्रकृतिक पंच स्थानों में होता है । यह स्थान संज्ञी पंचेन्द्रियों में ही होता है । चोइसग दसग सत्तग अहारसगेच शियम वावीसा । |ियमा भरगुसगईए विरदे मिस्से अविरदे य ॥ ३२ ॥ बाईस प्रकृतिक स्थान का संक्रम नियम से चौदह, दस, सात और अठारह प्रकृतिक स्थानों मनुष्य गति में ही विरत, देशविरत तथा अविरत सम्यक्त्वो गुणस्थानों में होता है । २ मार्गदर्शक :- आचार्य श्री सुविधिसागर जी महाराजू तेरसय गवय सत्तय सत्तारस पाय एककवीसाए । एमाधिए वीसाए संकमो छप्पि सम्मत्ते ॥ ३३ ॥ एकाधिकate प्रकृतिक स्थान का संक्रम तेरह, नौ, सात, सत्रह पांच तथा इक्कीस प्रकृतिक छह स्थानों में सम्यक्त्वयुक्त गुणस्थानों में होता है । F एतो अवसेसा संजमम्हि उवसामगे च खवगे च । वीसाय संक्रम- दुगे छक्के पणगे व बोद्धव्वा ॥३४॥ पूर्वोक्त स्थानों से शेष बचे संक्रम और प्रतिग्रह स्थान उपशमक और क्षपक संयतके ही होते हैं । १ पंचिदिएस चेव तेवीससंकमो णाणत्थे त्ति घेतव्वं । तत्थवि सणी पंचिदिए चैव णासणीसु ( १००० ) २ पियमा मणुसईए । कुदो एस नियमो ? सेसगईसु दंसणमोहक्खणाए श्रणुपुव्विसंकमस्य वा असंभवादो ।
SR No.090249
Book TitleKashaypahud Sutra
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorSumeruchand Diwakar Shastri
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages327
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size7 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy