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________________ -७२] ४. पकत्वानुप्रेक्षा [छाया-खजनः पश्यापि खलु न दुःखलेशमपि शक्नोति ग्रहीतुम् । एवं जाननपि खस ततः अपि ममत्त न त्यजति ॥] अपि पुनः, शक्नोति समर्थो भवति, न प्रहीद लातुम् । किम । दुःखलेश खकीयजनजातासातलेश कणिकाम् । कः । सुजेनोऽपि मातृपितृभ्रात्पुमायात्मजनोऽपि । अपिशब्दात् अन्योऽपि हु स्फुटं, पश्यन्नपि प्रेक्षमाणोऽपि, एवं जानन् अपि, हु स्फुटं, तो वि तथापि, ममत्वं न त्यजति ॥ ७ ॥ जीवस्स णिच्छयादो धम्मो दह-लक्षणो हवे सुयणो । सो णेइ देव-लोए सो चियं दुक्ख-क्खयं कुणइ ॥ ७८॥ [छाया-जीवस्य निश्चयतः धर्मः दशलक्षणः भवेत् स्वजनः । सः नयति देवलोके स एव दुःखक्षयं करोति ॥] खजनः आत्मीयजनः, निश्चयतः परमार्थनः, भवेत् । कस्य । जीवस्य आरमनः । कः । दशलक्षणः सत्तमक्षमादिदशलाक्षणिकधर्मः । स धमों जिनोकः, नयति प्रापयति, देवलोके सौधर्मादिनाकलोके । स एव दशगक्षणिकधर्मः करोति विदधाति । कम् । दुःखक्षयं चतुर्गतिदुःखाना विनाश ॥ ८ ॥ सवायरेण जाणेह एक जीवं सरीरदो भिणं । जम्हि दु मुणिदे जीवे होदि असेसं खणे हेयं ॥ ७९ ॥ [छाया-सवरेण जानीत एक जीवं शरीरतः भिन्नम् । यस्मिन् तु ज्ञाते जीवे भवति अशेष क्ष हेयम् ॥] सोदरेण समस्तोद्यमेन, जानीहि विद्धि, एकमातार्य जीव वेदानन्दम् । कोशम् । शरीरतः नोकर्मकर्मादभित्र पृथक् । तु पुनः । यस्मिन् जीव शुद्धचिद्रूपे ज्ञाते सति, क्षण क्षणतः, अशेष शरीरभित्रकलबधनधान्यादि व्याज्यं, भवति जायते ॥ ७९ ॥ एक श्रीशुभचन्द्रमिन्दनिकरैः सेव्य जिनं संभा, एक सन्मतिकीर्तिदायकमरे तत्त्वं स्मर स्मारय । एक जेनमतानुशास्त्रनिकर श्रव्ये कुरु प्रीतये, एकं ध्यानगत विशुद्धममलंपिमा घर ।। इति श्रीस्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षायास्थितियाविद्याधरपरमाषाकविचक्रवर्तिभट्टारकश्रीशुभचन्द्रदेवविरचितटीकायाम् एकस्वानुप्रेक्षा चतुर्थोऽधिकारा॥४॥ स्परम उसे जो मोह है, वह उसे नहीं छोड़ता है ॥ ७७ ॥ अर्थ-यथार्थमें जीरका आत्मीय जन उत्तम क्षमादिरूप दशलक्षणधर्म ही है । वह दशलक्षणधर्म सौधर्म आदि वर्गमे लेजाता है, और वही चारों गतियोंके दुःखोंका नाश करता है ।। भावार्थ-अपना सच्चा आत्मीय वही है, जो हमें सुख देता है और दुःखोंको दूर करता है । लौकिक सम्बन्धी न तो हमें सुख ही देते हैं और न दुःखोंसे ही हमारी रक्षा कर सकते हैं । किन्तु धर्म दोनों काम कर सकनेमें समर्थ है । अतः वही हमारा सच्चा बन्धु है, और उसीसे हमें प्रीति करना चाहिये ।। ७८ ॥ अर्थ-पूरे प्रयरनसे शरीरसे भिन्न एक जीवको जानो। उस जीवके जान लेनेपर क्षणभरमें ही शरीर, मित्र, खी, धन, धान्य वगैरह समी वस्तुएँ हेय होजाती हैं। भावार्थ-संसारकी दशा देखते हुए भी अपने कुटुम्बीजनोंसे जीवका मोह नहीं छूटता है। इसका कारण यह है, कि जीव अपनेको अभी नहीं जान सका है। जिस समय वह अपनी शुद्ध चैतम्यमय आत्माको जान लेगा, उसी समय उसे सभी परवस्तुएँ हेय प्रतीत होने लगेगी । अतः सब कुछ छोड़कर अपनेको जाननेका पूरा प्रयत्न करना चाहिये ॥ ७९ ॥ इति एकत्वानुप्रेक्षा ॥१॥ म स्वजनोरि। २ म सुवो। इस वि य । ४ सर्वत्र "विनाशं करोति' ति पाठः। ५माणा। । ७५मजीवो। कमसगबोई। ५एकत्ताणुवस्सा, मकवानुमेया। मसग
SR No.090248
Book TitleKartikeyanupreksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKumar Swami
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year
Total Pages589
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size19 MB
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