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________________ २. सूत्रकृतांग, ३. स्थानांग, ४. समवायांग, ५. व्याख्याप्रज्ञप्ति अंग, ६. धर्मकथांग, ७. उपासकाध्ययनांग, ८. अन्तःकृदशांग, ६. अनुत्तरोपपादिकदशांग, १०. प्रश्न-व्याकरणांग, ११. विपाकसूत्रांग और १२. दृष्टिवादांग। दृष्टिवादांग के पाँच भेद हैं- (१) परिकर्म, (२) सूत्र, (३) प्रथमानुयोग (४) पूर्वगत और (५) चूलिका । परिकर्म के पाँच भेद हैं- (१) चन्द्रप्रज्ञप्ति, (२) सूर्य-प्रज्ञप्ति, (३) जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति (४) द्वीप-सागरप्रज्ञप्ति और (५) व्याख्याप्रज्ञप्ति; पूर्वगत के चौदह भेद हैं- (9) उत्पादपूर्व, (२) आग्रायणीयपूर्व, (३) वीर्यप्रवाद, (४) अस्तिनास्तिप्रवाद, (५) ज्ञानप्रवाद, (६) सत्यप्रवाद (७) आत्मप्रवाद, (८) कर्मप्रवाद, (६) प्रत्याख्यान (१०) वीर्यानुवाद (११) कल्याणवाद, (१२) प्राणावाद, (१३) क्रियाविशाल और (१४) त्रिलोक-बिन्दुसार। चूलिका के पाँच भेद हैं- (१) जलगता, (२) स्थलगता, (३) मायागता, (४) आकाशगता और (५) रूपगता। अंगबाह्य श्रुतज्ञान के चौदह भेद हैं- (१) सामायिक, (७८)
SR No.090245
Book TitleKarananuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages149
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Agam, Canon, H000, H015, & agam_related_other_literature
File Size2 MB
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