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________________ सप्ततिका प्रकरण शब्दार्थ-अविसत्तधाञ्बंधो-अष्टविध, सप्तविध, पड्विध बंध के समय, अठेव-आठों कर्म की, उदयसंसाई-उदय और सला, एगबिहे-एकविध बंध के समम, तिविगप्पो-तीन विकल्प, एगविगप्पो--एक विकल्प, मबंधम्मि-अबन्ध दशा में, बंध ने होने पर। गाथार्थ--आठ, सात और छह प्रकार के कर्मों वा बंध होने के समय उदय और सत्ता आठों कर्म की होती है । एकविध (एक का) बंध होते समय नदय ब सत्ता की अपेक्षा तीन विकल्प होते हैं तथा बंध न होने पर उदय और सत्ता की अपेक्षा एक ही विकल्प होता है। विशेषार्थ--इस गाथा में मूल प्रकृतियों के बंध, उदय और सत्ता के संबैध भंगों का कथन किया गया है । ___ आठ प्रकृतिक, सात प्रकृतिक और छह प्रकृतिक बंध होने के समय आठों कर्मों का उदय और आठों कर्मों की सत्ता होती है-'अछेत्र उदयसंताई' । अर्थात् सातवें अप्रमत्तसंयत गुणस्थान तक के जीत्र मिश्र गुणस्थान को छोड़कर आयुबंध के समय आठों कमों का बंध कर सकते हैं अतः उनके आठ प्रकृतिक बंध, आठ प्रकृतिक उदय और आठ प्रकृतिक सत्ता होती है । अनिवृत्तिवादर संपराय गुणस्थान तक के जीव आयुकर्म के बिना शेष सात कर्मों का बंध करते हैं किन्तु उनके उदय और सत्ता आठ कर्मों की हो सकती है और सूक्ष्मसंपराय संयत आयु व मोहनीय कर्म के बिना छह कर्मों का बंध करते हैं लेकिन इनके भी आठ कर्मों का उदय और सत्ता होती है। इस प्रकार से कमों की बंध प्रकृतियों में भिन्नता होने पर उदय और सत्ता एक जैसी मानने का कारण यह है कि उपर्युक्त सभी जीव सराग होते हैं और सरागता का कारण मोहनीय कर्म का उदय है और जब मोहनीय कर्म का उदय है तब उसकी सत्ता अवश्य ही
SR No.090244
Book TitleKarmagrantha Part 6
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages573
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size9 MB
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