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________________ षष्ठ कर्मग्रन्थ ३४१ बंधस्थान मंग उदयस्थान सत्तास्थान प्रकृतिक U 4 प्रकृतिक - ૨૨ (4) अपूर्वकरण गुणस्थान आठवें अपूर्वकरण गुणस्थान में बंध आदि स्थान इस प्रकार हैं'पुणगेग पउ' अर्थात पांच बंधस्थान, एक उदयस्थान और चार सत्तास्थानः । इनमें से पांच बंधस्थान २८, २९, ३०, ३१ और १ प्रकृतिक है । इनमें से प्रारम्भ के चार बंषस्थान तो सातवें अप्रमत्तसंयत गुणस्थान के समान जानना चाहिये, किन्तु जब देवगतिप्रायोग्य प्रकृतियों का बंधविच्छेद हो जाता है तब सिर्फ एक यश:की ति नाम का ही बध होता है, जिससे यहाँ १ प्रकृतिक बंधस्थान भी होता है। यहाँ उदयस्थान एक ३० प्रकृतिक ही होता है। जिसके वनऋषभनाराच संहनन, छह संस्थान, सुस्वर-दुस्वर और दो विहायोगति के विकल्प से २४ भंग होते हैं | किन्तु कुछ आचार्यों के मत से उपशमणि की अपेक्षा अपूर्वकरण में केवल वज्रऋषभनाराच संहनन का उदय न होकर प्रारम्भ के तीन संहननों में से किसी एक का उदय होता है। अतः उनके मत से यहाँ पर ७२ भंग होते हैं। इसी प्रकार
SR No.090244
Book TitleKarmagrantha Part 6
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages573
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size9 MB
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