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________________ २८२ सप्ततिका प्रकरण हैं जो पदवृन्द महासे हैं। सर में की प्रकृतिक उदयस्थाग के २४१२ =२४ और एक प्रकृतिक उदयस्थान के ५ भंग इस प्रकार २६ मंगों को और मिला देने पर पदवृन्दों की कुल संख्या ८४७७ प्राप्त होती है । जिससे सब संसारी जीव मोहित हो रहे हैं कहा भी है पारसपगसढसया उपविग फेहि मोहिपा जोया । घुलसोईसत्तत्तरिपविषसहि विनेया ।। अर्थात ये संसारी जीव १२६५ उदयविकल्पों और ८४७७ पदवृन्दों से मोहित हो रहे हैं। गुणस्थानों की अपेक्षा उदयविकल्पों और पदवृन्दों का विवरण इस प्रकार जानना चाहिये--- क्रम सं० उदयस्थान गुणस्थान ___ भंग गुणनफल गुण्य (पदः)| गुणकार (पदवृन्द) १६३२ 19६८ १४४० १२४८ मिथ्यात्व ७,८,९,१०८ चौबीसी| ६८५ | सासादन ७,८,९,१०|| ४ चौबीसी| ३२ मिथ ७,८, ६ ४ चौबीसी अविरत' | ६,७,८,९, ८ चौबीसी देशविरत | ५,६,७,८ | 4 चौधोसी प्रमत्तविरत ] ४,५,६७ | ८ चौबीसी । ४४ अप्रमत्तविक | ८ चौबीसी अपूर्वकरण ४,५,६,७ | ४ चौबीसी & | अनिवृत्ति. | २, १ १६ भंग सूक्ष्म २४१४ १ मिथ्यात्व आबि गुणस्थानों में ६ आदि पद (गुण्य) होने का स्पष्टीकरण आगे की गाथाओं में किया जा रहा है।
SR No.090244
Book TitleKarmagrantha Part 6
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages573
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size9 MB
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