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________________ चतुर्थी से आगे की अर्थात् पन्चमी आदि सब भूमिकाएं सम्म दृष्टि वाली ही समझनी चाहिये; क्योंकि उनमें उत्तरोत्तर विकास तथा दृष्टि की शुद्धि अधिकाधिक होती जाती है । चतुर्थ गुणस्थानमें स्वरूप-दर्शन करने से आत्मा को अपूर्व शान्ति मिलती है और उसको विश्वास होता है कि अब मेरा साध्य-विषयक भ्रम दूर हुआ, अर्थात् अब तक जिस पौब्लिक व बाह्य सुख को में तरस रहा या, वह परिणाम - विरस अस्थिर एवं परिमित है। परिणाम सुन्दर, स्थिर व अपरिमित सुख स्वरूप प्राप्ति में ही है । तब गामो आत्मा स्वरुप स्थिति के लिये प्रयत्न करने लगता है। यह विकास मोह की प्रधान शक्ति - दर्शनमोह को शिथिल करके स्वरूपदर्शन कर लेने के बाद भी, जब तक उसकी दूसरी शक्ति - चारित्रमोह को शिथिल न किया जाय तब तक स्वरूप लाभ किंवा स्वरूपस्थिति नहीं हो सकती। इसलिये वह मोह की मन्य करने के लिये प्रयास करता है । जब · दूसरी शक्ति को वह उस शक्ति को भी उरकान्ति हो या परपरिणति त्याग होने से चतुर्थ भूमिका की अपेक्षा अधिक शान्ति-लाभ होता है । यह वेशविरति नामक पाँचवां गुणस्थान है ! अंशतः शिथिल कर जाती है । जिसमें पाता है; तब उसको और अंशत: स्वरूप- स्थिरता इस गुणस्थान में विकासयामी आत्मा को यह विचार होने लगता है कि यदि अल्प-विरतिसे ही इतना अधिक शान्ति-लाभ हुआ तो फिर सर्व विरति - जड़ भावों के सर्वधा परिहार से कितना शान्ति-लाभ न होगा । इस विचार से प्रेरित होकर व प्राप्त आध्यात्मिक शान्ति के अनुभव से बलवान् होकर वह विका सगामी आत्मा चारित्रमोह को अधिकांश में शिथिल करके पहलेकी अपेक्षा भी अधिक स्वरूप स्थिरता व स्वरूप लाभ प्राप्त करनेकी चेष्टा करता है । इस चेष्टा में कृतकृत्य होते ही उसे सर्व विरति
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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