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रोकने का अत्यन्त कठिन कार्य इसी के द्वारा किया जाता है, जो सहज नहीं है। एक बार इस कार्य में सफलता प्राप्त हो जाने पर फिर चाहे विकासामी आत्मा ऊपर की किसी भूमिका से गिर भी पड़े तथापि वह पुनः कमी-न-कभी अपने लक्ष्य को – आध्यात्मिक पूर्ण स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। इस आध्यात्मिक परिस्थिति का कुछ स्पष्टीकरण अनुभवगत व्यावहारिक स्ष्टान्त के द्वारा किया जा सकता है।
जैसे एक ऐसा वस्त्र हो, जिसमें मल के अतिरिक्त चिकनाहट भी लगी हो । उसका मल ऊपर-ऊपर से दूर करना उतना कठिन यदि और श्रम साध्य नहीं, जितना कि चिकनाहट का दूर करना 1 चिकनाहट एक बार दूर हो जाय तो फिर बाकी का मल निकालनेमें fear किसी कारण वश फिर से लगे हुए ग को दूर करने में विशेष श्रम नहीं पड़ता और वस्त्र को उसके असली स्वरूप में सहज ही लाया जा सकता है । ऊपर-ऊपर का मल बूर करने में जो बल वरकार है, उसके सा "यथाप्रवृत्तिकरण" है । चिकनाहट दूर करने वाले विशेष बल व अम के समान "अपूर्वकरण" है । जो चिकनाहट के समान राग-द्वेष की तीव्रतम प्रत्थि को शिथिल करता है । बाकी बचे हुए मल को fear चिकनाहट दूर होने के बाद फिरसे लगे हुए मलको कम करने वाले बल प्रयोग के समान "अनिवृत्तिकरण" हैं । उक्त तीनों प्रकार के बल प्रयोगों में चिकनाहट दूर करने वाला जल-प्रयोग ही विशिष्ट है ।
अथवा जैसे किसी राजा ने आत्म रक्षा के लिये अपने अङ्गरक्षकों को लोन विभागों में विभाजित कर रक्खा हो, जिनमें दूसरा विभाग शेष दो विभागों से अधिक बलवान् हो, तब उसी को जीतने
में विशेष बल लगाना पड़ता है। पहले उसके रक्षक राग-द्वेष के
वैसे
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तीन
ही दर्शनमोह को जीतने के संस्कारों को शिथिल करने के