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________________ कर्मग्रन्थ माग बार इसकी भी कल्पना से इस प्रकार समझना चाहिये । २५६ वश होते हैं, उनसे समग्र प्रतर के कल्पित १०२४०००००००००० को भाग देना भागने से हुए १५६२५०००० | यहो मान ज्योतिषी देवों का समझना चाहिये | अचि में वैमानिक देव, असङ्ख्यात हैं । इनकी असङ्ख्यात संख्या इस प्रकार बरसायी गयी है: - श्रङ्ग ुलमात्र आकश क्षेत्र के जितने प्रवेश हैं, उनके तीसरे वर्गमूल का धन' करने से जितने आकाश-प्रदेश हों, उतनी सूचि श्रेणियों के प्रवेशों के बराबर वैमानिकदेव' है । • इसको कल्पना से इस प्रकार बतलाया जा सकता है: -- अङ्ग सभात्र आकाश के २५६ प्रदेश हैं । २५६ का तीसरा वर्गमूल २२ का चम है । सुचि श्रेणियों के प्रवेश २५६०००० होते हैं। क्योंकि प्रत्येक सूचि श्रेणियों के प्रवेश, कल्पना से ३२००००० मान लिये गये हैं । यही संख्या वैमानिकों की संख्या समझनी चाहिये । भवनपति, ध्यन्तर ज्योतिषी और वैमानिक सब वेव मिलकर नारकों से असङ्ख्यातगुण होते हैं । वेवों से तिर्यञ्चों के अनन्तगुण होने का कारण यह है कि अनम्सकायिक वनस्पति जीव, जो संख्या में अनन्त हैं, वे भी तियंत्र हैं । क्योंकि वनस्पतिकायिक जीवों को तिर्यक्रचगतिनाम कर्म का उपय होता है ||३७|| M १२१ 1 १- किसी संख्या के वर्ग के साथ उस संख्या को गुणने से जो गुणनफल प्राप्त होता है, वह उस संख्या का घन है'। जैसे:--०४ का वर्ग १६ - उसके साथ ४ को गुणने से ६४ होता है । यही चार का घन है। २- सब वैमानिकों की संख्या गोम्मटसार में एक साथ न देकर जुदा-जुदा दी है -- जीव० गा० १६०–१६२ ।
SR No.090242
Book TitleKarmagrantha Part 4
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages363
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size5 MB
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