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________________ तृतीय कर्मग्रथ 1 रहती हैं, और उनमें जिनपंचक तीर्थंकर नामकर्म देवद्विक और वैक्रियfre को मिलाने से ७५ प्रकृतियों का बन्ध चौथे गुणस्थान में होता है । 我装 शंका- चौथे गुणस्थान के समय औदारिकमिश्र काययोग में जिन ७५ प्रकृतियों का बन्धस्वामित्व कहा है, उनमें मनुष्यद्विक, aarfrefae और वज्रऋषभनाराच सहनन इन पांच प्रकृतियों का समावेश है। इस पर श्री जीवविजयजी ने अपने टबे में शंका उठाई है कि चौथे गुणस्थान में औदारिकमिश्र काययोगी उक्त पाँच प्रकृतियों at afs नहीं सकता है। क्योंकि तिच तथा मनुष्य के सिवाय दूसरों से यह योग संभव नहीं है और नियंत्र तथा मनुष्य इस गुणस्थान में उक्त पाँच प्रकृतियों को बाँध नहीं सकते हैं. अतएव तियंचगति और मनुष्यगति में चौथे गुणस्थान के समय कम में जो ७० और ७१ प्रकृतियों का Fatafore कहा गया है, उसमें उक्त पांच प्रकृतियों नहीं आती हैं । 4 इसका समाधान श्री जयसोमसूरि ने अपने टबे में किया है कि गाथागत 'असा' इस पद का अर्थ 'अनन्तानुबन्धी आदि २४ प्रकृतियाँ' यह नहीं करना चाहिए, किन्तु 'आह' शब्द में और भी पांच प्रकृतियाँ लेकर अनन्तानुबन्धी आदि २४ तथा मनुष्यद्विक आदि पाँच कुल २६ प्रकृतियाँ यह अर्थ कदना चाहिये। ऐसा अर्थ करने से उक्त सन्देह नहीं रहता। क्योंकि ९४ में से २० घटाने से शेष रही ६५ प्रकृतियों में जिनपंचक मिलाने से ७० प्रकुतियाँ होती हैं. जिनका बन्धस्वामित्व उस योग में उक्त गुणस्थान के समय किसी तरह विरुद्ध नहीं है । यह समाधान प्रामाणिक जान पड़ता है । दूसरी बात यह है कि मूल गाथा में ७५ संख्या का बोधक कोई : पद नहीं है। श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती भी दूसरे गुणस्थान में २० प्रकृतियों का विच्छेद मानते हैं पण्णरससुनती मिरगे अविर छिवी चउरो । गो० कर्मकाण्ड, माया ११६ +
SR No.090241
Book TitleKarmagrantha Part 3
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages267
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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