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अन्धस्वामिक
पुरा बन जाना माना जा सकता है । 'सरीर निपफत्तो' पद का यह अर्थ स्वकल्पित नहीं है। इस मर्ग का सपन पद सरकारी देने सूरि में स्वरचित चौथे कर्मग्रन्थ की चौथी माया' के 'समुप जरलमग्ने 'इस अंश की निम्नलिखित टीका में किया है --
यपि तेषां शरीर पर्यादितः अवजनिष्ट संबायोनियोधासा. मामाध्यनिध्ययन गरीरस्यासपूर्णस्वातएव कार्मणस्यास्यापि धाप्रियमा स्वाचारिक मिश्रमेव सेवा युक्त्या घाटमामकार्मात । ___ अब यह भी पक्ष है कि स्वयोग्य सब पर्याप्तियां पूरी हो जाने तक औदारिकमिश्न काययोग रहता है, सब औक्षारिकांमध काय योग शरीरपर्याप्ति के पूर्ण होने पर्यन्त रहता है, आगे नहीं और आयुबंध भरीरपर्याप्ति और इन्द्रियपर्याप्ति पूर्ण हो जाने के बाद होता. हैं, पहले नहीं--इस संदेह को कुछ भी अवकाश नहीं रहता है । क्योंकि इन्द्रियपर्याप्ति पूर्ण बन जाने के बाद जब कि आयुबंध का अवसर आता है, तब भी औदारिकमिश्र काययोग तो रहता ही है । इसलिये औदारिकमिश्र काययोग में मिथ्याल मुणस्थान के समय मनुष्यायु और तियं चायु--इन दो आयुओं का बन्धस्वामित्व माना जाना इस पक्ष की अपेक्षा युक्त ही है। ___ मिथ्यात्व गुणरथाम के समय औदारिकमिश्र काययोग में उक्त दो आयुओं के .संध का पक्ष जैसा कर्मग्रन्थ में निर्दिष्ट किया गया है। वैसा ही गोम्मटसार कर्मकाण्ड में भी बताया है
लोरा या मिस्मे ण सुरणिरयाउहाणि रयधुर्ग :
मिहसुन बमोतिर ण हि अविरदे अत्यि ॥११॥ अर्थात् ....औदारिकमित्र काययोग में औदारिक काययोमचत रचना जानना । विशेष बात यह है कि देवायु, नरकायु, आहारकाद्विक, नरकगति, नरकानुपूर्वी-- इन छह प्रकृतियों का बन्ध भी नहीं होता है।
१ अपमसछविक कम्मुरलमीस जोगा अपजमन्निसु से ! - सविन्धमीस एस. तापजे उरलमन्ले ।।