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________________ ५१ असीम कर्म प्रस्त्र ___औदारिकमिश्र काययोग में पहले मिथ्यात्व गुणस्थान के समय जिनपंचक- तीर्थङ्करलामकर्म, देवति, देवानुपूर्वी, बैंक्रिय शरीर, वैकय अंगोपांग को सामान्य से बंधयोग्य ११४ प्रकृतियों में से कम करने पर १०६ प्रकृतियों का बंध होता है। औदारिकमिश्र काययोग में जो १०१ प्रकृतियों का बंधस्वामित्व मिथ्याश्व गुणस्थान में माना गया है, उसमें मनुष्यायु और तिथंचायु का भी प्रहण किया गया है। इस सम्बन्ध में शीलांकाचार्य का मत है कि औदारिकमिश्र काययोग शरीरपर्याप्ति के पूर्ण होने के पूर्व तक होता है। श्री भद्रबाहु स्वामी ने भी इसी मत के समर्थन में युक्ति दी है.---. जोएण कम्मएणं आहारे अतरं जीवो। लेग पर मौसेनं जरख सरोर मिस्फती ।। इसको लेकर श्री जीवविजयजी ने अपने टब में शंका उठाई है कि औदारिकमिश्र काययोग शरीरपर्याप्ति के पूर्ण होने पर्यन्त रहता है, आगे नहीं और आयुबंध शरीरपर्याप्ति और इन्द्रियपर्याप्ति पूरी हो जाने के बाद होता है, पहले नहीं । अतएव औदारिकमिश्र काययोग के समय, अर्थात् गरीरपर्याप्ति पूर्ण होने से पूर्व आयु का बंध सम्भव नहीं है। इसलिए उक्त दो आयुओं का १०६ प्रकृतियों में ग्रहण विचारणीय है। लेकिन यह कोई नियम नहीं है कि शरीरपर्याप्ति पूरी होने पर्यन्त औदारिकमिश्न काययोग माना जाय, आगे नहीं। श्री भद्रबाहु स्वामी ने जो युक्ति दी है उसमें 'सरीर निक्कली' पद का यह अर्थ नहीं है कि शरीर पूर्ण बन जाने पर्यन्त उपक योग रहता है । शरीर की पूर्णता केबल शरीरपर्याप्ति के बन जाने से नहीं हो सकती है । इसके लिए जीव का अपने-अपने योग्य इन्द्रिय, श्वासोच्छवास, भाषा और मन सब पर्याप्तियों के पूर्ण हो जाने में ही शरीर का १. औदारिककाययोगस्ति मनुष्ययोः शरीरपर्याप्तकर्वम् । ...आबाटोका
SR No.090241
Book TitleKarmagrantha Part 3
Original Sutra AuthorDevendrasuri
AuthorShreechand Surana, Devkumar Jain Shastri
PublisherMarudharkesari Sahitya Prakashan Samiti Jodhpur
Publication Year
Total Pages267
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size4 MB
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